पटना। बिहार में 2025 में हुए विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) के दौरान मतदाता सूची में नाम शामिल होने और नाम नहीं होने को लेकर कई सवाल सामने आए। इसी क्रम में पटना के दीघा विधानसभा क्षेत्र से जुड़े शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता रौशन प्रकाश ने दावा किया कि लंबे समय से मतदान करने के बावजूद उनका नाम 1 अगस्त 2025 को प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची में नहीं मिला।
रौशन प्रकाश के मुताबिक वे वर्ष 2005 से विधानसभा, लोकसभा और स्थानीय निकाय चुनावों में मतदान करते रहे हैं। उनके पास मतदाता पहचान पत्र भी है। इसके बावजूद SIR की प्रक्रिया के बाद जब उन्होंने अपना नाम ड्राफ्ट मतदाता सूची में तलाशा तो उन्हें नाम नहीं मिला।
उनका कहना है कि उन्होंने SIR के दौरान आवश्यक फॉर्म भरा और दस्तावेज भी जमा किए थे। इसके बावजूद नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं होने को लेकर उन्होंने प्रक्रिया पर सवाल उठाए।
SIR प्रक्रिया, मतदाता सूची में नाम नहीं मिलने और उठाए गए सवालों पर रौशन प्रकाश से विशेष बातचीत का पूरा वीडियो यहां देखें।
ड्राफ्ट मतदाता सूची में नाम नहीं मिलने का मामला
रौशन प्रकाश का कहना है कि उनका नाम 1 अगस्त 2025 को प्रकाशित ड्राफ्ट मतदाता सूची में नहीं मिला। उन्होंने यह भी दावा किया कि बाद में सार्वजनिक की गई उन मतदाताओं की सूची में भी उनका नाम नहीं था, जो पहले की मतदाता सूची में दर्ज थे लेकिन नई ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं हो पाए।
चुनाव आयोग के अनुसार, 24 जून 2025 की मतदाता सूची में शामिल करीब 7.89 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 65 लाख नाम 1 अगस्त 2025 की ड्राफ्ट मतदाता सूची में शामिल नहीं थे। आयोग ने ऐसे मतदाताओं की सूची राजनीतिक दलों के साथ साझा की थी, ताकि नामों की जांच की जा सके।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भी बाद में लगभग 65 लाख ऐसे मतदाताओं की सूची कारणों के साथ प्रकाशित करने और पात्र लोगों को दावा दाखिल करने की सुविधा देने का निर्देश दिया था।
रौशन प्रकाश ने प्रक्रिया पर उठाए सवाल
रौशन प्रकाश का आरोप है कि उन्होंने SIR के दौरान अपना फॉर्म जमा किया और आवश्यक दस्तावेज भी दिए, लेकिन इसके बावजूद उनका नाम ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं हुआ।
उनका कहना है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया में बूथ लेवल अधिकारियों पर काम का दबाव था और कई स्थानों पर पर्याप्त संसाधनों की कमी महसूस हुई। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि यदि कोई पात्र मतदाता अपना फॉर्म और दस्तावेज जमा करने के बाद भी ड्राफ्ट सूची में नहीं आता है, तो उसे इसकी जानकारी और समाधान किस तरह मिलेगा।
उन्होंने कहा कि मतदाता सूची से जुड़े मामलों में आम लोगों को प्रक्रिया की स्पष्ट जानकारी और समय पर सहायता मिलना जरूरी है।
65 लाख मतदाताओं का मामला क्या था?
SIR को समझने के लिए 65 लाख के आंकड़े की स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है।
चुनाव आयोग के अनुसार, 24 जून 2025 की मतदाता सूची में शामिल करीब 7.89 करोड़ मतदाताओं में से लगभग 65 लाख लोग 1 अगस्त 2025 की ड्राफ्ट मतदाता सूची में शामिल नहीं थे। इसका अर्थ यह नहीं था कि इन सभी लोगों को अंतिम रूप से मतदाता सूची से बाहर कर दिया गया था।
आयोग ने ड्राफ्ट सूची प्रकाशित करने के बाद दावा और आपत्ति दाखिल करने की प्रक्रिया उपलब्ध कराई थी। आयोग के अनुसार, 1 अगस्त से 1 सितंबर 2025 के बीच पात्र मतदाताओं को नाम शामिल कराने और अपात्र नामों को लेकर आपत्ति दर्ज कराने का अवसर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने भी 65 लाख के करीब बाहर रह गए मतदाताओं को दावा दाखिल करने में सहायता देने के निर्देश दिए थे। कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि पात्र व्यक्ति स्वयं या राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंटों की सहायता से दावा दाखिल कर सकते हैं।
रौशन प्रकाश का सवाल: अगर नाम नहीं है तो कारण क्या है?
रौशन प्रकाश का कहना है कि उनके जैसे मतदाता के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि वह पहले से मतदाता सूची में दर्ज था और मतदान करता रहा है, तो पुनरीक्षण के बाद उसका नाम ड्राफ्ट सूची में क्यों नहीं है।
उनके मुताबिक किसी पात्र मतदाता का नाम सूची में नहीं मिलने की स्थिति में उसे यह जानने का अधिकार होना चाहिए कि उसका नाम किस कारण से शामिल नहीं किया गया और उसे दोबारा सूची में शामिल कराने के लिए क्या प्रक्रिया अपनानी होगी।
उनका कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता और नागरिकों तक सही जानकारी पहुंचना बेहद जरूरी है।
मतदाता सूची में नाम और लोकतांत्रिक भागीदारी
मतदाता सूची चुनाव प्रक्रिया की बुनियादी व्यवस्था है। किसी चुनाव में मतदान करने के लिए पात्र व्यक्ति का नाम संबंधित मतदाता सूची में होना आवश्यक है।
इसी वजह से मतदाता पुनरीक्षण की प्रक्रिया में दो बातें एक साथ महत्वपूर्ण होती हैं—एक तरफ मृत, स्थानांतरित या अपात्र मतदाताओं के नामों को सही करना और दूसरी तरफ पात्र मतदाताओं के नामों को सूची में बनाए रखना।
रौशन प्रकाश का मामला इसी दूसरे पहलू को लेकर सवाल उठाता है। उनका कहना है कि किसी पात्र मतदाता को प्रक्रिया संबंधी समस्या के कारण मतदान के अधिकार से वंचित नहीं होना चाहिए।
चुनाव आयोग की प्रक्रिया में दावा-आपत्ति का प्रावधान
SIR के दौरान चुनाव आयोग ने ड्राफ्ट मतदाता सूची प्रकाशित करने के बाद दावे और आपत्तियों की प्रक्रिया निर्धारित की थी। आयोग के आधिकारिक दस्तावेज के अनुसार, 1 अगस्त से 1 सितंबर 2025 तक पात्र मतदाता छूटे हुए नामों को शामिल कराने के लिए दावा कर सकते थे, जबकि ड्राफ्ट सूची में मौजूद अपात्र नामों के खिलाफ आपत्ति भी दर्ज की जा सकती थी।
आयोग ने यह भी कहा था कि ड्राफ्ट सूची में किसी नाम को बिना नोटिस और संबंधित अधिकारी के आदेश के हटाया नहीं जा सकता।
बिहार के लिए आयोग ने उन मतदाताओं की अलग सूची भी उपलब्ध कराई थी जिनके नाम 2025 की पिछली मतदाता सूची में थे, लेकिन 1 अगस्त 2025 की ड्राफ्ट सूची में शामिल नहीं थे।
व्यक्तिगत मामला बना व्यापक सवाल
रौशन प्रकाश का मामला एक व्यक्तिगत मतदाता के अनुभव से जुड़ा है, लेकिन इससे मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया को लेकर व्यापक सवाल भी सामने आते हैं।
एक पात्र मतदाता के लिए यह जरूरी है कि वह आसानी से यह पता कर सके कि उसका नाम मतदाता सूची में है या नहीं। यदि नाम नहीं है तो उसे कारण और आगे की प्रक्रिया की जानकारी भी स्पष्ट रूप से मिलनी चाहिए।
SIR जैसी व्यापक प्रक्रिया में यह व्यवस्था इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि बड़ी संख्या में मतदाताओं की जानकारी एक साथ सत्यापित की जाती है।
SIR को लेकर रौशन प्रकाश से पूरी बातचीत
रौशन प्रकाश ने SIR की प्रक्रिया, मतदाता सूची में अपना नाम नहीं मिलने और इससे जुड़े सवालों पर The Azadi से विस्तार से बातचीत की।
इस बातचीत में उन्होंने अपने मामले के साथ-साथ मतदाता सूची के पुनरीक्षण, दस्तावेजों, बूथ स्तर पर काम और पात्र मतदाताओं के सामने आने वाली संभावित परेशानियों पर भी अपनी बात रखी।
निष्कर्ष
रौशन प्रकाश का मामला SIR की पूरी प्रक्रिया पर अंतिम निष्कर्ष नहीं है, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि किसी व्यक्तिगत मतदाता का नाम ड्राफ्ट सूची में नहीं मिलने की स्थिति में कारण, सूचना और दावा दर्ज कराने की प्रक्रिया कितनी महत्वपूर्ण है।
चुनाव आयोग ने SIR के दौरान दावा और आपत्ति की व्यवस्था रखी थी और पात्र मतदाताओं को अपना नाम शामिल कराने का अवसर दिया था। वहीं रौशन प्रकाश जैसे मामलों से यह सवाल सामने आता है कि जमीनी स्तर पर इस प्रक्रिया की जानकारी और सहायता आम मतदाताओं तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंची।
मतदाता सूची को अधिक सटीक बनाने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि कोई पात्र मतदाता केवल प्रक्रिया संबंधी समस्या के कारण अपने मतदान के अधिकार से वंचित न रह जाए।




