अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के नतीजों के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर राजनीतिक दबाव बढ़ने और भारत के लिए अमेरिकी टैरिफ से जुड़े जोखिम कम होने की संभावना जताई गई है। एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की एक नई रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी कांग्रेस पर रिपब्लिकन पार्टी का एकीकृत नियंत्रण समाप्त होने से भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते को लेकर तत्काल दबाव कम हो सकता है। इसे भारत के लिए सकारात्मक घटनाक्रम माना जा रहा है, क्योंकि इससे अचानक टैरिफ बढ़ने और व्यापारिक अनिश्चितताओं का खतरा कुछ हद तक घट सकता है।
रिपोर्ट के अनुसार, भारत पर 18 प्रतिशत की प्रस्तावित अमेरिकी टैरिफ दर कभी लागू नहीं हुई और फिलहाल भारतीय उत्पादों पर अपेक्षाकृत कम 10 प्रतिशत का सेक्शन 301 शुल्क लागू है। इसके साथ ही अमेरिका अब इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत मिलने वाले कुछ प्रभावी दबाव बनाने वाले विकल्पों का इस्तेमाल नहीं कर पाएगा।
ट्रंप के लिए व्यापारिक फैसले लेना हो सकता है मुश्किल
रिपोर्ट में कहा गया है कि मध्यावधि चुनावों के नतीजों से अमेरिकी टैरिफ व्यवस्था में तत्काल कोई बड़ा बदलाव होने की संभावना नहीं है, लेकिन इससे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक प्राथमिकताएं प्रभावित हो सकती हैं।
विश्लेषकों के मुताबिक, अब ट्रंप के पास व्यापारिक तनाव बढ़ाने के सीमित विकल्प होंगे। वहीं, अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए कीमतें नियंत्रित रखने और 2028 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले व्यापारिक समझौते करने का दबाव बढ़ सकता है।
भविष्य में यदि अमेरिका कोई नया व्यापारिक कदम उठाता है, तो उसे सेक्शन 301 या सेक्शन 232 जैसी अपेक्षाकृत धीमी और जांच-आधारित प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ सकता है। इससे अचानक टैरिफ लगाने या व्यापारिक प्रतिबंधों का जोखिम कम हो सकता है।
हालांकि, रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि व्यापार नीति ऐसा क्षेत्र है, जहां अमेरिकी राष्ट्रपति के पास अब भी पर्याप्त अधिकार मौजूद हैं। इसलिए टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितता और बाजार में उतार-चढ़ाव पूरी तरह खत्म नहीं होंगे।
भारत के फार्मा और इलेक्ट्रॉनिक्स सेक्टर पर जोखिम बरकरार
रिपोर्ट में भारत के लिए कुछ संभावित जोखिमों की भी पहचान की गई है। इनमें फार्मास्युटिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों पर सेक्शन 232 के तहत संभावित टैरिफ शामिल हैं।
इसके अलावा रूस या ईरान से जुड़े कूटनीतिक प्रयासों में किसी तरह की विफलता भारत के कच्चे तेल के आयात पर दोबारा दबाव बढ़ा सकती है।
विश्लेषकों का मानना है कि कमजोर अमेरिकी डॉलर, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और टैरिफ को लेकर अनिश्चितता कम होने से भारतीय अर्थव्यवस्था को फायदा मिल सकता है। इससे रुपये की स्थिरता को समर्थन मिलेगा, निर्यातकों की संभावनाएं बेहतर होंगी और भारतीय परिसंपत्तियों पर जोखिम प्रीमियम धीरे-धीरे कम हो सकता है।
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से भारत को राहत
रिपोर्ट के मुताबिक, ब्रेंट क्रूड अक्टूबर 2026 के उच्चतम स्तर से करीब 19 प्रतिशत गिरकर 94 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आ गया है। भारत के लिए यह महत्वपूर्ण राहत है, क्योंकि चालू वित्त वर्ष में अब तक देश का तेल आयात बिल 24 प्रतिशत बढ़ चुका है और ब्रेंट क्रूड का औसत मूल्य लगभग 97 डॉलर प्रति बैरल रहा है।
कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को भी कुछ राहत मिल सकती है। रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये को स्थिर रखने की लागत लगातार बढ़ रही थी।
रुपये और ब्याज दरों पर आरबीआई को सतर्क रहना होगा
विश्लेषकों के अनुसार, चालू खाते के घाटे के वित्तपोषण की जरूरत और आरबीआई की बैलेंस शीट पर लगभग 239 अरब डॉलर की फॉरवर्ड डॉलर देनदारियां मौजूद हैं। ऐसे में केंद्रीय बैंक दीर्घकालिक पूंजी प्रवाह का इस्तेमाल विदेशी मुद्रा भंडार और मुद्रा सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने में कर सकता है। इससे रुपये में अत्यधिक तेजी की संभावना सीमित रह सकती है।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व भविष्य में ब्याज दरों को लेकर नरम रुख अपनाए, तब भी अमेरिका में लगातार ऊंची मुद्रास्फीति के कारण ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं। ऐसे में भारतीय रिजर्व बैंक को भी मौद्रिक नीति के मोर्चे पर सतर्क रहना होगा।
कुल मिलाकर, अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद बदले राजनीतिक समीकरण, कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट और टैरिफ संबंधी अनिश्चितता कम होने से भारत को राहत मिलने की संभावना है। हालांकि, फार्मा, इलेक्ट्रॉनिक्स और ऊर्जा आयात से जुड़े जोखिम अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं।




