Sunday, 1 November 2026
राजनीति

CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ INDIA गठबंधन की मॉक संसद में ‘जन महाभियोग’ प्रस्ताव पारित, जानिए किसने क्या कहा

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ INDIA गठबंधन ने शनिवार, 31 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में प्रतीकात्मक ‘जन महाभियोग’ की मॉक संसदीय कार्यवाही आयोजित की। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास 10, राजाजी मार्ग पर आयोजित इस कार्यक्रम में विपक्षी दलों के सांसदों, वरिष्ठ राजनीतिक नेताओं, छात्र संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया। करीब तीन घंटे चली इस कार्यवाही में मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ छह आरोपों वाला प्रस्ताव पेश किया। समाजवादी पार्टी के सांसद हरेंद्र मलिक ने प्रस्ताव का समर्थन किया, जबकि लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इसके समर्थन में समापन संबोधन दिया। अंत में उपस्थित लोगों ने हाथ उठाकर प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित किया।

इस पूरे कार्यक्रम की अध्यक्षता लोकसभा की पूर्व अध्यक्ष मीरा कुमार ने की। विपक्ष ने यह आयोजन चुनाव आयोग की निष्पक्षता, मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), कथित वोट चोरी और नागरिकों के मताधिकार से जुड़े सवालों को सार्वजनिक मंच पर उठाने के उद्देश्य से किया।

यह संसद की वास्तविक संवैधानिक महाभियोग प्रक्रिया नहीं, बल्कि INDIA गठबंधन की ओर से आयोजित प्रतीकात्मक जन महाभियोग और मॉक संसदीय कार्यवाही थी।

मीरा कुमार की अध्यक्षता में हुई मॉक संसद की कार्यवाही

कार्यक्रम की शुरुआत पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार के संबोधन से हुई। उन्हें इस प्रतीकात्मक मॉक संसद का अध्यक्ष बनाया गया था। आयोजन स्थल को पुराने लोकसभा सदन की तर्ज पर तैयार किया गया था। मंच पर लकड़ी के पैनल वाला बैकग्राउंड, अर्धवृत्ताकार बैठने की व्यवस्था और पहली तीन पंक्तियों में सांसदों के लिए माइक्रोफोन लगाए गए थे।

मीरा कुमार ने अपने शुरुआती संबोधन में मतदाता सूची से पात्र नागरिकों के नाम गलत तरीके से हटाए जाने की शिकायतों और इस मामले में जवाबदेही के अभाव पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब INDIA गठबंधन इस मुद्दे को उठाता है तो जवाबदेही दिखाई नहीं देती। इसी वजह से गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने का प्रस्ताव सार्वजनिक रूप से रखने का निर्णय लिया।

इस मॉक संसद में समाजवादी पार्टी के सांसद अवधेश प्रसाद और तृणमूल कांग्रेस के सांसद सौगत राय को उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी गई थी।

कार्यक्रम में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दलों समेत कम-से-कम 18 राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी की जानकारी सामने आई।

मल्लिकार्जुन खड़गे ने पेश किया छह आरोपों वाला प्रस्ताव

कांग्रेस अध्यक्ष और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की मौजूदा कार्यप्रणाली से देश की चुनावी व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

खड़गे ने कहा कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 के तहत नागरिकों को मिला सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार आज गंभीर खतरे में है। उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग की भूमिका निष्पक्ष संस्था के अनुरूप नहीं रह गई है और मुख्य चुनाव आयुक्त केंद्र सरकार के दबाव में काम कर रहे हैं।

खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का नाम लेते हुए आरोप लगाया कि ज्ञानेश कुमार उनके निर्देशों पर काम कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि विपक्ष का उद्देश्य किसी व्यक्ति से व्यक्तिगत विवाद करना नहीं, बल्कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का विश्वास कायम रखना है।

प्रस्ताव में मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ छह प्रमुख आरोप लगाए गए।

1. चुनावों में कथित हेरफेर और वोट चोरी की साजिश

पहले आरोप में INDIA गठबंधन ने मुख्य चुनाव आयुक्त पर भाजपा द्वारा राष्ट्रीय और राज्यस्तरीय चुनावों को प्रभावित करने की कथित साजिश में शामिल होने का आरोप लगाया। प्रस्ताव में कहा गया कि मतदाता सूची तक पहुंच, नाम जोड़ने और हटाने की प्रक्रिया का कथित दुरुपयोग कर चुनावी नतीजों को प्रभावित किया गया।

2. SIR के माध्यम से 13.2 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाने का आरोप

दूसरे आरोप में कहा गया कि विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR के माध्यम से कथित तौर पर 13.2 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए। विपक्ष ने इस प्रक्रिया को पक्षपातपूर्ण और अपारदर्शी बताते हुए कहा कि इससे पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकार पर असर पड़ सकता है।

3. Form 6 में बदलाव का आरोप

तीसरे आरोप में Form 6 से जुड़े बदलावों पर सवाल उठाए गए। Form 6 का इस्तेमाल नए मतदाताओं को मतदाता सूची में शामिल करने के लिए किया जाता है।

विपक्ष का आरोप था कि संसद की जानकारी और निगरानी के बिना इसमें अतिरिक्त शर्तें जोड़ी गईं, जिससे पहली बार मतदान करने वाले युवाओं के पंजीकरण में कठिनाई पैदा हो सकती है।

4. ECINET और ERONET के माध्यम से मतदाता सूची पर नियंत्रण केंद्रीकृत करने का आरोप

चौथे आरोप में चुनाव आयोग के डिजिटल प्लेटफॉर्म ECINET और ERONET की भूमिका पर सवाल उठाया गया।

विपक्ष ने आरोप लगाया कि मतदाता सूची के प्रबंधन और बदलाव की प्रक्रिया को केंद्रीकृत कर दिया गया, जिससे स्थानीय स्तर पर निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (ERO) की भूमिका प्रभावित हुई और पात्र मतदाताओं के नाम जोड़ने में बाधाएं पैदा हुईं।

5. अन्य दो चुनाव आयुक्तों को निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखने का आरोप

पांचवें आरोप में कहा गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने चुनाव आयोग के अन्य दो आयुक्तों को महत्वपूर्ण निर्णय लेने की प्रक्रिया से अलग रखा।

प्रस्ताव में यह भी दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने पिछले दस महीनों में कम-से-कम 14 बार आपत्तियां दर्ज की थीं। विपक्ष ने इसे चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और संस्थागत स्वतंत्रता से जुड़ा गंभीर सवाल बताया।

6. संवैधानिक जिम्मेदारी के विपरीत काम करने का आरोप

छठे आरोप में मुख्य चुनाव आयुक्त पर संवैधानिक जिम्मेदारियों का उल्लंघन करने और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तथा गृह मंत्री अमित शाह के निर्देश पर काम करने का आरोप लगाया गया।

प्रस्ताव में यह भी दावा किया गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त के परिवार के कुछ सदस्यों को कथित तौर पर लाभकारी पद और अवसर मिले। विपक्ष ने इन आरोपों की जांच और जवाबदेही की मांग की।

इन सभी आरोपों को INDIA गठबंधन की ओर से लगाए गए आरोपों के रूप में ही देखा जाना चाहिए। मॉक संसद में प्रस्ताव पारित होने से ये आरोप न्यायिक रूप से सिद्ध नहीं हो जाते।

राहुल गांधी ने कहा- यह जनता के वोटों की रक्षा की लड़ाई है

खड़गे के प्रस्ताव के बाद कई नेताओं ने अपनी बात रखी। कार्यक्रम का समापन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के संबोधन से हुआ।

राहुल गांधी ने इस पूरी कार्यवाही को उन लोगों के खिलाफ एक राजनीतिक हथियार बताया, जिन पर उन्होंने देश के नागरिकों के वोट नष्ट करने में मिलीभगत का आरोप लगाया।

उन्होंने कहा कि यह असाधारण स्थिति है कि देश के विपक्षी दलों को मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अपनी बात रखने के लिए संसद के बजाय एक निजी आवास के लॉन में मॉक संसद आयोजित करनी पड़ रही है।

राहुल गांधी ने दावा किया कि SIR के दौरान 13.3 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए हैं। उन्होंने इस आंकड़े को देश के कुल मतदाताओं का लगभग 15 प्रतिशत बताया और आरोप लगाया कि इससे चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर गंभीर सवाल उठते हैं।

उन्होंने ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रस्ताव का समर्थन करते हुए कहा कि उनके खिलाफ पर्याप्त सबूत हैं और उन्हें पद पर बने रहने नहीं दिया जाना चाहिए।

राहुल गांधी ने अपने संबोधन में कहा कि मुख्य चुनाव आयुक्त को उस संस्था के पीछे छिपना नहीं चाहिए जिसकी रक्षा की जिम्मेदारी उन्हें सौंपी गई है। उन्होंने मांग की कि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए और उन्हें अदालत में मुकदमे का सामना करना चाहिए।

राहुल गांधी के संबोधन के बाद उपस्थित लोगों ने हाथ उठाकर प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पारित किया।

कपिल सिब्बल ने सरकार को बताया ‘दिमागी बुलडोजर’

इस कार्यक्रम में वरिष्ठ अधिवक्ता, पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और राज्यसभा के स्वतंत्र सांसद कपिल सिब्बल ने भी अपना संबोधन दिया।

सिब्बल ने केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा कि विपक्ष को ‘दिमागी नक्सल’ कहने वाले खुद संविधान और नागरिकों के वोटों पर दिमागी बुलडोजर चला रहे हैं।

उन्होंने सवाल उठाया कि विपक्ष को यह कार्यक्रम आयोजित करने की जरूरत क्यों पड़ी। उनका कहना था कि जब विपक्ष संसद में अपनी बात रखना चाहता है तो उसे पर्याप्त अवसर नहीं मिलता, विरोध करने पर पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ता है और मुख्यधारा का मीडिया भी सरकार के पक्ष को अधिक जगह देता है।

सिब्बल ने मुख्य चुनाव आयुक्त की तुलना शतरंज के मोहरे से करते हुए कहा कि इस पूरे विवाद में केवल एक अधिकारी को जिम्मेदार मानकर बात समाप्त नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि उन लोगों की भूमिका भी देखी जानी चाहिए जो सत्ता में बैठकर फैसलों को प्रभावित करते हैं।

उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त को मिले कानूनी संरक्षण पर भी सवाल उठाए और इसे संस्थागत जवाबदेही के लिहाज से महत्वपूर्ण विषय बताया।

AISA अध्यक्ष नेहा बोरा ने उठाया युवाओं के मताधिकार का सवाल

ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा ने अपने संबोधन में पहली बार मतदान करने वाले युवाओं और नए मतदाताओं के अधिकारों का मुद्दा उठाया।

उन्होंने आरोप लगाया कि Form 6 से जुड़े बदलावों के कारण युवा मतदाताओं के पंजीकरण में बाधाएं पैदा हो सकती हैं। उनका कहना था कि लोकतंत्र में 18 वर्ष की आयु पूरी करने वाले प्रत्येक पात्र नागरिक को मतदाता सूची में शामिल होने का अधिकार मिलना चाहिए।

नेहा बोरा ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित 2023 के कानून पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि नियुक्ति समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल किए जाने से चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को लेकर चिंता पैदा होती है।

नेहा बोरा के संबोधन में चुनावी प्रक्रिया को केवल राजनीतिक दलों का मुद्दा नहीं, बल्कि छात्रों और युवाओं के भविष्य तथा उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ा विषय बताया गया।

योगेंद्र यादव ने कहा- ‘मुख्य चुनाव आयुक्त’ नहीं, ‘मुख्य चुनाव अभियुक्त’

सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता और स्वराज अभियान से जुड़े योगेंद्र यादव ने भी कार्यक्रम में अपनी बात रखी।

उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के पदनाम पर राजनीतिक कटाक्ष करते हुए उन्हें ‘मुख्य चुनाव आयुक्त’ की जगह ‘मुख्य चुनाव अभियुक्त’ कहा।

उनका संबोधन चुनाव आयोग की निष्पक्षता, मतदाता सूची की विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के भरोसे से जुड़े सवालों पर केंद्रित रहा।

सागरिका घोष ने पश्चिम बंगाल चुनाव को लेकर लगाए आरोप

तृणमूल कांग्रेस की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने अपने संबोधन में पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची और 2026 के विधानसभा चुनाव का मुद्दा उठाया।

उन्होंने दावा किया कि SIR के दौरान पश्चिम बंगाल में ‘Logical Discrepancy’ श्रेणी के तहत 27 लाख मतदाताओं के नाम हटाए गए।

उन्होंने सवाल उठाया कि इस श्रेणी का निर्माण किसने किया और किसके निर्देश पर मतदाताओं के नाम हटाने की कार्रवाई हुई।

सागरिका घोष ने आरोप लगाया कि 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जाने से चुनावी नतीजे प्रभावित हुए। उन्होंने कुछ विधानसभा सीटों के संदर्भ में हटाए गए मतदाताओं की संख्या और जीत के अंतर का भी जिक्र किया।

ये तृणमूल कांग्रेस की ओर से लगाए गए गंभीर आरोप हैं। इनकी स्वतंत्र पुष्टि के लिए संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों के आधिकारिक आंकड़ों, मतदाता सूची और चुनाव परिणामों का अलग से परीक्षण जरूरी है।

समाजवादी पार्टी और वामपंथी दलों ने भी उठाए सवाल

समाजवादी पार्टी के सांसद हरेंद्र मलिक ने मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव का समर्थन किया। उन्होंने SIR को PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े मतदाताओं पर सीधा प्रहार बताया।

उन्होंने आरोप लगाया कि इस प्रक्रिया के माध्यम से अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और अल्पसंख्यक समुदायों के मतदाताओं के नाम प्रभावित हो रहे हैं।

वामपंथी दलों के प्रतिनिधियों ने भी सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और चुनाव आयोग की जवाबदेही का मुद्दा उठाया। CPI सांसद पी. संदोश कुमार, CPI(M) सांसद जॉन ब्रिटास और CPI(ML) लिबरेशन के सांसद सुदामा प्रसाद समेत अन्य नेताओं ने अपनी बातें रखीं।

तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोइत्रा और अन्य विपक्षी प्रतिनिधियों ने भी इस कार्यवाही में हिस्सा लिया।

सिविल सोसाइटी और मतदाता सूची से प्रभावित नागरिकों की भागीदारी

इस कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह था कि इसमें केवल राजनीतिक दलों के सांसद और वरिष्ठ नेता ही शामिल नहीं थे।

सिविल सोसाइटी के प्रतिनिधियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को भी अपनी बात रखने का अवसर दिया गया। योगेंद्र यादव और निखिल डे जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं की मौजूदगी रही।

इसके साथ ही उन लोगों को भी मंच पर बोलने का अवसर मिला जिन्होंने दावा किया कि SIR के दौरान उनके या उनके परिवार के सदस्यों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए।

इस भागीदारी के माध्यम से विपक्ष ने मतदाता सूची के विवाद को राजनीतिक दलों से आगे बढ़ाकर आम नागरिकों के मतदान के अधिकार से जोड़ने की कोशिश की।

आखिर 13.37 करोड़ मतदाताओं के नाम हटने का मामला क्या है?

इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण और तथ्यात्मक रूप से जांचने योग्य पहलू SIR के दौरान मतदाता सूची में हुई बड़ी संख्या में कटौती है।

इंडियन एक्सप्रेस की 1 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयोग के आंकड़ों के आधार पर SIR के तीन चरणों में 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की ड्राफ्ट मतदाता सूचियों में कुल 13.37 करोड़ नाम कम हुए। यह SIR से पहले की मतदाता सूची के मुकाबले करीब 14.1 प्रतिशत की कमी थी।

इस आंकड़े में उन नामों को भी शामिल किया गया है जिन्हें मृत, स्थायी रूप से स्थानांतरित, एक से अधिक जगह दर्ज या सत्यापन के दौरान अनुपलब्ध पाए जाने जैसी श्रेणियों में रखा गया।

लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। ड्राफ्ट मतदाता सूची से 13.37 करोड़ नाम कम होना और 13.37 करोड़ पात्र मतदाताओं का जानबूझकर मतदान के अधिकार से वंचित किया जाना एक ही बात नहीं है।

विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया में बड़ी संख्या में पात्र मतदाताओं के नाम भी गलत तरीके से हटाए गए। दूसरी ओर चुनाव आयोग का कहना है कि मतदाता सूची की शुद्धता के लिए पुनरीक्षण जरूरी है और पात्र नागरिकों को दावा तथा आपत्ति की प्रक्रिया के माध्यम से नाम जुड़वाने का अवसर उपलब्ध है।

इस विवाद के बीच चुनाव आयोग ने 20 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में SIR पूरा होने के बाद मतदाता सूची से छूट गए लोगों को शामिल करने के लिए विशेष अभियान चलाने का निर्देश भी दिया था। इसके तहत Form 6 के माध्यम से दोबारा पंजीकरण का रास्ता उपलब्ध कराया गया।

इसलिए इस पूरे मामले में तीन अलग-अलग आंकड़ों की जांच जरूरी है—ड्राफ्ट सूची से हटे कुल नाम, वास्तव में पात्र मतदाताओं के गलत तरीके से हटे नाम और दावे-आपत्तियों के बाद दोबारा जोड़े गए नाम।

Form 6 विवाद पर चुनाव आयोग का क्या पक्ष है?

नेहा बोरा और अन्य विपक्षी नेताओं ने Form 6 में बदलाव को लेकर सवाल उठाए। इस विवाद पर चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया था कि वैधानिक Form 6 में औपचारिक संशोधन नहीं किया गया था। SIR प्रक्रिया के दौरान इसके साथ एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र (Declaration/Annexure D) जोड़ा गया था।

चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाब में कहा कि Form 6 का प्रारूप बदलने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है। आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि ऑनलाइन पोर्टल पर फॉर्म और अतिरिक्त घोषणा-पत्र को जिस तरीके से प्रदर्शित किया गया, उससे ऐसा समझा जा सकता था कि Form 6 में संशोधन कर दिया गया है।

इसके बाद SIR पूरा हो चुके राज्यों में ECINET पोर्टल से अतिरिक्त घोषणा को हटाया गया।

यह घटनाक्रम बताता है कि Form 6 को लेकर उठे सवाल केवल राजनीतिक भाषणों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि चुनाव आयोग की ऑनलाइन प्रक्रिया और उसके प्रशासनिक निर्णयों पर भी चर्चा हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने SIR पर क्या फैसला दिया था?

SIR विवाद को समझने के लिए 27 मई 2026 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला भी महत्वपूर्ण है।

Association for Democratic Reforms बनाम Election Commission of India मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में कराए गए SIR की वैधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर फैसला सुनाया।

अदालत ने माना कि संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 21(3) के तहत चुनाव आयोग को विशेष गहन पुनरीक्षण कराने का अधिकार है।

अदालत ने बिहार में अपनाई गई प्रक्रिया और दस्तावेजी व्यवस्था की समीक्षा की। फैसले में कहा गया कि मतदाता सूची में पात्र नागरिकों को शामिल रखना और सूची की वास्तविक स्थिति को सही बनाए रखना, दोनों लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए जरूरी हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन लोगों के नाम गलत तरीके से हटाए गए हों, वे संबंधित प्राधिकरण के समक्ष अपना दावा कर सकते हैं और आवश्यक स्थिति में न्यायिक समीक्षा का रास्ता भी उपलब्ध है।

इस फैसले का दायरा बिहार में 2025 में कराए गए SIR से संबंधित था। इसे देश के प्रत्येक राज्य में हुई हर कार्रवाई की स्वतः न्यायिक पुष्टि नहीं माना जा सकता।

CEC को वास्तव में हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है?

इस पूरे कार्यक्रम में ‘महाभियोग’ शब्द का इस्तेमाल प्रतीकात्मक और राजनीतिक अर्थ में किया गया। वास्तव में मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324(5) में दी गई है।

इसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की तरह समान तरीके और समान आधार पर हटाया जा सकता है। इसके लिए साबित कदाचार (Proved Misbehaviour) या अक्षमता (Incapacity) का आधार होना जरूरी है।

12 मार्च 2026 को विपक्षी सांसदों ने ज्ञानेश कुमार को हटाने के लिए लोकसभा में 130 और राज्यसभा में 63 सांसदों के हस्ताक्षर वाला नोटिस दिया था।

6 अप्रैल 2026 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला और राज्यसभा के सभापति सी.पी. राधाकृष्णन ने इन नोटिसों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। दोनों सदनों की ओर से जारी जानकारी में निर्णय की पुष्टि हुई, लेकिन विस्तृत कारण सार्वजनिक नहीं किए गए।

नियमों के तहत लोकसभा में कम-से-कम 100 और राज्यसभा में कम-से-कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर से ऐसा नोटिस दिया जा सकता है। नोटिस स्वीकार होने के बाद जांच की प्रक्रिया शुरू होती है। इसके बाद दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पारित होना और राष्ट्रपति का आदेश जरूरी होता है।

इसलिए 31 अक्टूबर को आयोजित मॉक संसद में पारित प्रस्ताव का ज्ञानेश कुमार के पद पर कोई स्वतः कानूनी प्रभाव नहीं पड़ा।

भाजपा ने जन महाभियोग कार्यक्रम पर क्या कहा?

INDIA गठबंधन के इस कार्यक्रम पर भाजपा ने भी प्रतिक्रिया दी।

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा ने इसे संसद और लोकतंत्र का मजाक बताया। उन्होंने राहुल गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि विपक्ष उन्हें जीवनभर अपना ‘मॉक प्रधानमंत्री’ बनाए रख सकता है।

संबित पात्रा ने आरोप लगाया कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल वोट चोरी के नाम पर गलत जानकारी फैला रहे हैं। उन्होंने चुनाव आयोग की प्रक्रिया का बचाव करते हुए कहा कि SIR का उद्देश्य मतदाता सूची को शुद्ध करना और मृत तथा अपात्र लोगों के नाम हटाना है।

Form 6 के विवाद पर भाजपा ने कहा कि मूल फॉर्म में संशोधन नहीं किया गया था, बल्कि उसके साथ एक अतिरिक्त घोषणा-पत्र जोड़ा गया था।

भाजपा ने चुनाव आयोग के निर्णयों को सर्वसम्मत बताते हुए कहा कि पात्र भारतीय नागरिकों को मतदान का अधिकार मिलना चाहिए, लेकिन मतदाता सूची में अपात्र लोगों के नाम बने रहना भी स्वीकार्य नहीं है।

इस तरह विपक्ष और भाजपा के बीच विवाद का मूल प्रश्न मतदाता सूची की शुद्धता, पात्र नागरिकों के अधिकार और चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर बना हुआ है।

लोकतंत्र और चुनाव आयोग की विश्वसनीयता से जुड़े कई सवाल

31 अक्टूबर की इस मॉक संसद का महत्व केवल एक प्रस्ताव पारित होने तक सीमित नहीं है। इस कार्यक्रम ने भारत की चुनावी व्यवस्था और संवैधानिक संस्थाओं की जवाबदेही से जुड़े कई महत्वपूर्ण सवाल फिर से चर्चा में ला दिए हैं।

सबसे पहला सवाल यह है कि मतदाता सूची का पुनरीक्षण करते समय किसी भी पात्र नागरिक का नाम छूटने से कैसे बचाया जाए। चुनाव आयोग के लिए सूची को साफ और अद्यतन रखना जरूरी है, लेकिन इस प्रक्रिया में किसी नागरिक का मतदान का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए।

दूसरा सवाल चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया और पारदर्शिता का है। यदि किसी संस्थागत निर्णय को लेकर आयोग के आयुक्तों के बीच आपत्तियां सामने आती हैं तो उन पर स्पष्ट जानकारी और जवाबदेही होनी चाहिए।

तीसरा सवाल चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा शर्तों को लेकर है। चुनाव आयोग की स्वतंत्रता लोकतंत्र की बुनियादी जरूरत है। इसलिए नियुक्ति प्रक्रिया, कानूनी संरक्षण और संस्थागत स्वायत्तता पर सार्वजनिक बहस महत्वपूर्ण है।

चौथा सवाल यह है कि संवैधानिक संस्थाओं को लेकर किसी भी राजनीतिक विवाद का समाधान केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आरोपों की निष्पक्ष जांच, आधिकारिक आंकड़ों की उपलब्धता और नागरिकों की शिकायतों का समय पर समाधान जरूरी है।

INDIA गठबंधन ने 31 अक्टूबर को मॉक संसद में प्रस्ताव पारित कर अपना राजनीतिक विरोध दर्ज कराया। भाजपा ने इसे राजनीतिक प्रदर्शन बताते हुए आरोपों को खारिज किया। लेकिन मतदाता सूची, SIR, Form 6 और चुनाव आयोग की जवाबदेही से जुड़े मुद्दे अब भी सार्वजनिक बहस के केंद्र में हैं।

यह ख़बर साझा करें:
लेखक

Abhishek Kumar

अभिषेक कुमार पिछले 8 वर्षों से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय स्वतंत्र पत्रकार और वीडियो जर्नलिस्ट हैं। वे The Azadi (दी आज़ादी) के संस्थापक हैं। वे बिहार सहित विभिन्न जनसरोकार से जुड़े मुद्दों, राजनीति, समाज, लोकतंत्र और स्थानीय घटनाओं पर समाचार रिपोर्टिंग, ग्राउंड रिपोर्ट, वीडियो कवरेज, साक्षात्कार और विश्लेषण करते हैं

The Azadi के माध्यम से वे उन खबरों और जनसमस्याओं को प्रमुखता देने का प्रयास करते हैं, जिन्हें अक्सर मुख्यधारा के मीडिया में पर्याप्त जगह नहीं मिल पाती।

अपनी बात कहें