पटना। फिदेल कास्त्रो की जन्मशताब्दी वर्ष के अवसर पर अखिल भारतीय शांति एवं एकजुटता संगठन (AIPSO) की ओर से पटना में ‘फिदेल कास्त्रो : विरासत और भविष्य’ विषय पर परिचर्चा आयोजित की गई। माध्यमिक शिक्षक संघ भवन में हुए कार्यक्रम में साहित्यकारों, शिक्षाविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने क्यूबा की क्रांति तथा फिदेल कास्त्रो की राजनीतिक विरासत पर अपने विचार रखे।
फिदेल कास्त्रो का जन्म 13 अगस्त 1926 को हुआ था। वर्ष 2026 में उनकी जन्मशताब्दी मनाई जा रही है। क्यूबा में भी इस मौके पर उनके जीवन और विरासत को लेकर कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं।
क्यूबा क्रांति और फिदेल कास्त्रो की भूमिका पर चर्चा
कार्यक्रम की शुरुआत क्यूबा के राष्ट्रीय गीत से हुई। इसके बाद फिदेल कास्त्रो और उनके साथी चे ग्वेरा से संबंधित रचनाओं तथा साहित्यकार गेब्रियल गार्सिया मार्केज की फिदेल कास्त्रो पर लिखी कविता का पाठ किया गया। कविता पाठ पटना आर्ट कॉलेज के पूर्व प्राचार्य अजय पांडेय और शायर संजय कुमार कुंदन ने किया। कार्यक्रम का संचालन रौशन प्रकाश ने किया।
विषय प्रवेश करते हुए AIPSO के राज्य महासचिव अनीश अंकुर ने फिदेल कास्त्रो के जीवन और क्यूबा की क्रांति का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कास्त्रो दुनिया भर के आम लोगों के लिए आशा और उम्मीद के केंद्र बने रहे। उनके मुताबिक क्यूबा ने अमेरिकी दबाव के बीच शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की।
अनीश अंकुर ने क्यूबा के सामाजिक विकास को फिदेल कास्त्रो के नेतृत्व की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में गिनाया। उन्होंने कहा कि कास्त्रो का जोर केवल राजनीतिक सत्ता हासिल करने पर नहीं, बल्कि समाज के निर्माण पर भी था।
उन्होंने फिदेल कास्त्रो की हत्या की साजिशों का भी उल्लेख किया। कास्त्रो के खिलाफ 638 हत्या की साजिशों का आंकड़ा लंबे समय से विभिन्न स्रोतों में उद्धृत होता रहा है, हालांकि इसमें योजनाओं और वास्तविक प्रयासों के बीच अंतर किया जाता है।
अरुण कमल ने क्यूबा यात्रा के अनुभव साझा किए
साहित्य अकादमी से सम्मानित कवि अरुण कमल ने अपने संबोधन में फिदेल कास्त्रो और भारत के संबंधों का उल्लेख किया। उन्होंने क्यूबा की अपनी यात्रा के अनुभव भी साझा किए और वहां की साफ-सफाई तथा सार्वजनिक जीवन से जुड़े अपने अनुभव बताए।
अरुण कमल ने कहा कि आज के दौर में वर्ग संघर्ष और पूंजीवाद-मजदूर वर्ग के संबंधों पर फिर से चर्चा की जरूरत है। उन्होंने क्यूबा की क्रांति के सामाजिक प्रभावों को इसी संदर्भ में देखने की बात कही।
फिदेल कास्त्रो और जवाहरलाल नेहरू के संबंधों का जिक्र करते हुए उन्होंने दोनों नेताओं के बीच हुई मुलाकात को भी याद किया। ऐतिहासिक रिकॉर्ड के मुताबिक 1960 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान न्यूयॉर्क में कास्त्रो और नेहरू की मुलाकात हुई थी। उस समय कास्त्रो के न्यूयॉर्क प्रवास और होटल से जुड़े विवाद के बाद वे हार्लेम स्थित होटल थेरेसा में ठहरे थे।
क्यूबा के मौजूदा संकट और अंतरराष्ट्रीय एकजुटता पर जोर
AIPSO के एक अन्य महासचिव सर्वोदय शर्मा ने क्यूबा के सामने मौजूद मौजूदा चुनौतियों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि क्यूबा ने अलग-अलग परिस्थितियों में अपने रास्ते पर आगे बढ़ने का प्रयास किया है और वर्तमान समय में भी देश गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है।
उन्होंने 1990 के दशक में क्यूबा की मदद के लिए वामपंथी दलों और संगठनों की ओर से किए गए प्रयासों का उल्लेख करते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर क्यूबा के प्रति एकजुटता की जरूरत है।
क्यूबा इस समय गंभीर आर्थिक और ऊर्जा संकट से गुजर रहा है। 13 अगस्त 2026 को फिदेल कास्त्रो की जन्मशताब्दी के मौके पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी उनके राजनीतिक और ऐतिहासिक प्रभाव को लेकर चर्चा हुई।
वक्ताओं ने फिदेल कास्त्रो को बताया प्रेरणा का स्रोत
पत्रकार विकास कुमार झा ने फिदेल कास्त्रो को विश्व स्तर का नेता बताते हुए कहा कि उनकी राजनीतिक विरासत का प्रभाव आज भी क्यूबा में दिखाई देता है।
पटना कॉलेज के पूर्व प्राचार्य प्रो. तरुण कुमार ने कहा कि फिदेल कास्त्रो ने मार्क्सवाद को अपने तरीके से समझा और विचार को केंद्र में रखा। उन्होंने कास्त्रो को आज भी प्रेरणा देने वाला व्यक्तित्व बताया।
सामाजिक कार्यकर्ता विजयश्री डांगरे ने क्यूबा की क्रांति के बाद महिलाओं से जुड़े संगठनों और कानूनों में हुए बदलावों का उल्लेख किया। उन्होंने महिलाओं के हित में किए गए विभिन्न प्रयासों पर चर्चा की।

रामबाबू ने कास्त्रो की राजनीतिक विरासत का किया उल्लेख
अध्यक्षीय संबोधन में AIPSO के महासचिव रामबाबू ने फिदेल कास्त्रो के राजनीतिक जीवन और क्यूबा की सामाजिक-राजनीतिक व्यवस्था में आए बदलावों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कास्त्रो ने अपने जीवन में अलग-अलग दौर में राजनीतिक और सरकारी जिम्मेदारियां निभाईं और बाद में सत्ता की जिम्मेदारियां छोड़ीं।
रामबाबू ने क्यूबा में धर्म और राज्य के संबंधों में आए बदलावों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि क्यूबा में बाद के दौर में धार्मिक संस्थाओं के साथ संबंधों में बदलाव आया और पोप जॉन पॉल द्वितीय की क्यूबा यात्रा भी इसी क्रम का एक महत्वपूर्ण प्रसंग रही।
उन्होंने कहा कि फिदेल कास्त्रो की विरासत को केवल अतीत के संदर्भ में नहीं, बल्कि मौजूदा वैश्विक परिस्थितियों के संदर्भ में भी देखने की जरूरत है।
कार्यक्रम में रामलाला सिंह, सुधाकर, महेश प्रसाद, गौतम गुलाल, शिबली इमाम, उज्ज्वल कुमार, विनोद कुमार वीनू, गजनफर नवाब, राजीव रंजन, जितेंद्र कुमार, कुमार सर्वेश, विश्वमोहन चौधरी संत, रोहित और अभिषेक विद्रोही सहित कई लोग मौजूद रहे।



