बिहार में चल रहे विशेष गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR-2025) को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। चुनाव आयोग का दावा है कि मृतक और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाकर सूची को शुद्ध किया जा रहा है, लेकिन पटना के दीघा विधानसभा क्षेत्र में रहने वाले शिक्षक और सामाजिक कार्यकर्ता रौशन प्रकाश का मामला इस प्रक्रिया की खामियों को उजागर करता है।
नाम न ड्राफ्ट सूची में, न डिलीटेड सूची में
रौशन प्रकाश 2005 से लगातार हर विधानसभा, लोकसभा और स्थानीय निकाय चुनाव में मतदान करते रहे हैं। उनके पास मान्य वोटर आईडी है जो आधार और मोबाइल नंबर से लिंक है। इसके बावजूद न तो उनका नाम ड्राफ्ट रोल (Draft Roll) में है और न ही सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद जारी की गई 65 लाख हटाए गए मतदाताओं की सूची में।
“हम इस एसआईआर प्रणाली के पीड़ित हैं। हमारा नाम न इधर है, न उधर। यह पूरी व्यवस्था खामियों से भरी है और इसका खामियाजा वास्तविक मतदाता भुगत रहे हैं।” – रौशन प्रकाश
प्रक्रिया में खामियों के आरोप
रौशन प्रकाश का कहना है कि उन्होंने गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) का फॉर्म भरा था और दस्तावेज़ भी जमा किए थे, फिर भी नाम गायब है। वे आरोप लगाते हैं कि यह काम जल्दबाज़ी और तकनीकी कमी के साथ किया गया।
- बीएलओ (बूथ लेवल अधिकारी) की संख्या कम थी और संसाधन भी अपर्याप्त थे।
- नागरिकों से बार-बार फॉर्म भरवाए गए, जबकि जिम्मेदारी आयोग की होनी चाहिए।
- कुछ लोग न तो मतदाता सूची में हैं, न ही हटाए गए नामों की सूची में — उनके लिए कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है।
लोकतांत्रिक अधिकार पर चोट
रौशन प्रकाश चेतावनी देते हैं कि यह सिर्फ उनकी व्यक्तिगत समस्या नहीं है, बल्कि चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकती है। 2020 बिहार विधानसभा चुनाव में लगभग 35 सीटें 3,500 वोटों के अंतर से तय हुई थीं। उनका कहना है कि अगर 1–2% मतदाताओं के नाम ही गायब कर दिए जाएं तो नतीजों की विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाएगी।
“मतदान संवैधानिक अधिकार है। अगर चुनाव आयोग ही वास्तविक मतदाता को सूची से बाहर कर दे, तो यह अधिकार का हनन है।” – रौशन प्रकाश
सवालों के घेरे में चुनाव आयोग
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही आदेश दिया था कि हटाए गए नामों की सूची कारण सहित प्रकाशित हो, लेकिन रौशन प्रकाश जैसे मामलों में कारण तक दर्ज नहीं है। इससे चुनाव आयोग की पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।
रौशन प्रकाश का मामला दिखाता है कि गहन मतदाता पुनरीक्षण की प्रक्रिया में गंभीर खामियाँ हैं। लाखों नाम हटाने का दावा करने वाले चुनाव आयोग को यह सुनिश्चित करना होगा कि कोई वास्तविक मतदाता सूची से बाहर न हो। यह सिर्फ तकनीकी गड़बड़ी नहीं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़ा सवाल है।