पटना में केदार दास श्रम एवं समाज अध्ययन संस्थान के परिसर में आयोजित जगन्नाथ सरकार सभागारऔर गौरी गांगुली कक्ष का उद्घाटन समारोह में बोलते हुए ऑल इंडिया ट्रेड यूनियन कांग्रेस (AITUC) की महासचिव अमरजीत कौर ने बीजेपी – आरएसएस और मोदी सरकार की नीतियों पर तीखा हमला बोला. समारोह में उन्होने तकरीबन 45 मिनट के लम्बे भाषण में श्रम कानून, मजदूरों की समस्या, देश की आर्थिक और विदेश निति और बीजेपी आरएसएस पर खुलकर बोली.
उनका यह भाषण महज़ किसी सभागार के उद्घाटन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसमें मौजूदा भारत की श्रम नीति, आर्थिक दिशा, लोकतांत्रिक स्थिति और वैचारिक राजनीति पर व्यापक और तीखी टिप्पणी देखने को मिली। अमरजीत कौर ने जिस स्पष्टता और आक्रामकता के साथ नए श्रम कानूनों, BJP-RSS की राजनीति और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार को कटघरे में खड़ा किया, उसने इस भाषण को केवल ट्रेड यूनियन वक्तव्य नहीं, बल्कि एक समकालीन राजनीतिक दस्तावेज बना दिया।

अमरजीत कौर: ट्रेड यूनियन आंदोलन की एक अनुभवी आवाज़
अमरजीत कौर भारतीय ट्रेड यूनियन आंदोलन का जाना-पहचाना नाम हैं। AITUC जैसी ऐतिहासिक संस्था, जिसने औपनिवेशिक भारत से लेकर आज तक मजदूर वर्ग की लड़ाइयों को नेतृत्व दिया है, उसकी महासचिव के रूप में अमरजीत कौर लंबे समय से श्रमिक अधिकारों, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों की पक्षधर रही हैं।
अपने भाषण के शुरुआती हिस्से में ही उन्होंने यह स्पष्ट किया कि मजदूर आंदोलन को केवल वेतन या काम के घंटों की लड़ाई तक सीमित करके देखना एक भूल है। उनके शब्दों में, “श्रमिक आंदोलन लोकतंत्र की रीढ़ है। जब-जब मजदूर वर्ग कमजोर हुआ है, तब-तब लोकतंत्र भी कमजोर हुआ है।”
ऐतिहासिक संदर्भ: श्रम अधिकार और लोकतंत्र की साझी यात्रा
अमरजीत कौर ने अपने वक्तव्य में भारतीय श्रमिक आंदोलन के इतिहास को रेखांकित किया। उन्होंने याद दिलाया कि आठ घंटे का कार्यदिवस, न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा और संगठित यूनियनें किसी सरकार की कृपा से नहीं मिलीं, बल्कि लंबे और कठिन संघर्षों के परिणामस्वरूप अस्तित्व में आईं।
उनका कहना था कि आज जिस तरह श्रम कानूनों को ‘सरलीकरण’ और ‘सुधार’ के नाम पर बदला जा रहा है, उसमें इतिहास से सबक लेने की कोई इच्छा नहीं दिखती। उन्होंने कहा कि सरकारें बदलती रही हैं, लेकिन मजदूरों की मूल समस्याएँ बनी रही हैं, और मौजूदा सरकार उन समस्याओं को सुलझाने के बजाय और जटिल बना रही है।
नए श्रम कानून: सुधार नहीं, अधिकारों में कटौती
अमरजीत कौर के भाषण का सबसे बड़ा और सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा केंद्र सरकार द्वारा लाए गए चार नए श्रम कानूनों पर केंद्रित रहा। उन्होंने बार-बार इस बात पर ज़ोर दिया कि इन कानूनों को जिस तरह बिना व्यापक परामर्श और संसदीय चर्चा के लाया गया, वह अपने आप में लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सवाल खड़ा करता है।
1. वेतन संहिता और न्यूनतम मजदूरी का भ्रम
वेतन संहिता को लेकर अमरजीत कौर ने कहा कि सरकार न्यूनतम मजदूरी को लेकर भ्रम की स्थिति पैदा कर रही है। उन्होंने सवाल किया कि जब न्यूनतम मजदूरी जीवन-यापन की वास्तविक लागत से जुड़ी ही नहीं होगी, तो मजदूर सम्मानजनक जीवन कैसे जी सकेगा?
उनका आरोप था कि राज्यों को मजदूरी तय करने की खुली छूट देकर सरकार असमानताओं को और गहरा रही है। “एक ही काम करने वाला मजदूर अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग मजदूरी पाए, यह किस तरह का न्याय है?”—उन्होंने पूछा।\2. औद्योगिक संबंध संहिता: यूनियनों को कमजोर करने का प्रयास
औद्योगिक संबंध संहिता पर अमरजीत कौर का हमला सीधा और कड़ा था। उन्होंने कहा कि यह कानून हड़ताल के अधिकार को लगभग निष्प्रभावी बना देता है। लंबी नोटिस अवधि और कानूनी जटिलताओं के ज़रिये मजदूरों की सामूहिक आवाज़ को दबाने की कोशिश की जा रही है।
उनके मुताबिक, सरकार ‘औद्योगिक शांति’ की बात तो करती है, लेकिन वास्तव में वह शांति मजदूरों की चुप्पी से स्थापित करना चाहती है।
3. सामाजिक सुरक्षा संहिता और असंगठित क्षेत्र की अनदेखी
भारत का लगभग 90 प्रतिशत श्रमबल असंगठित क्षेत्र में काम करता है। अमरजीत कौर ने कहा कि सामाजिक सुरक्षा संहिता में असंगठित मजदूरों का ज़िक्र तो है, लेकिन उनके लिए ठोस और बाध्यकारी प्रावधान नहीं हैं।
ठेका मजदूर, प्रवासी श्रमिक, घरेलू कामगार और गिग वर्कर्स—इन सबके लिए सुरक्षा आज भी काग़ज़ी वादों तक सीमित है।
4. कार्यस्थल सुरक्षा: मुनाफ़े बनाम जान
कार्यस्थल सुरक्षा और स्वास्थ्य संहिता पर बोलते हुए अमरजीत कौर ने कहा कि नियमों में ढील मजदूरों की जान के लिए खतरा है। उन्होंने औद्योगिक हादसों का ज़िक्र करते हुए कहा कि उत्पादन और मुनाफ़े की होड़ में सुरक्षा मानकों को कमजोर करना किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्मनाक है।
बेरोज़गारी, महँगाई और निजीकरण: मजदूरों पर तिहरा हमला
अमरजीत कौर ने कहा कि आज मजदूर वर्ग तीन स्तरों पर संकट झेल रहा है—
- बेरोज़गारी,
- महँगाई,
- निजीकरण।
उनके अनुसार, सरकार विकास और आत्मनिर्भरता के बड़े-बड़े दावे करती है, लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि रोज़गार के अवसर घटते जा रहे हैं।
उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के निजीकरण को विशेष रूप से निशाने पर लिया। “रेलवे, बीमा, बैंक—सब कुछ बेचा जा रहा है। यह न केवल रोज़गार खत्म करता है, बल्कि सामाजिक सुरक्षा की पूरी संरचना को ध्वस्त करता है,”—उन्होंने कहा।
BJP-RSS और मोदी सरकार की नीतियों पर खुला राजनीतिक हमला
वैचारिक राजनीति और असहमति का दमन
अमरजीत कौर ने अपने भाषण में BJP और RSS की वैचारिक राजनीति पर तीखा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि मौजूदा दौर में असहमति को देशद्रोह के बराबर खड़ा किया जा रहा है। ट्रेड यूनियन आंदोलनों, छात्र आंदोलनों और सामाजिक संगठनों को ‘विकास विरोधी’ बताकर बदनाम किया जा रहा है।
उनका कहना था कि यह प्रवृत्ति केवल मजदूरों के लिए नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र के लिए खतरनाक है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी: सत्ता का केंद्रीकरण और कॉरपोरेट मॉडल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर बोलते हुए अमरजीत कौर ने कहा कि मौजूदा आर्थिक मॉडल में श्रम को लगातार कमजोर किया जा रहा है और पूंजी को असाधारण ताकत दी जा रही है।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार कॉरपोरेट हितों के अनुरूप नीतियाँ बना रही है, जबकि मजदूरों की समस्याएँ हाशिए पर चली गई हैं। निजीकरण, श्रम कानूनों में बदलाव और सामाजिक खर्चों में कटौती—ये सब उसी दिशा के संकेत हैं।

राष्ट्रवाद बनाम रोज़गार
अमरजीत कौर ने कहा कि राष्ट्रवाद के नारों के पीछे बेरोज़गारी, महँगाई और असमानता जैसे सवालों को छुपाया जा रहा है। उन्होंने कहा कि सच्चा राष्ट्रवाद वही है जो अपने नागरिकों को सम्मानजनक जीवन दे सके।
उनके शब्दों में, “भूखे पेट और असुरक्षित रोज़गार के साथ कोई भी देश महान नहीं बन सकता।”
महिलाएँ, गिग वर्क और नया श्रम बाज़ार
महिला श्रमिकों की घटती भागीदारी पर अमरजीत कौर ने गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि असमान वेतन, असुरक्षित कार्यस्थल और सामाजिक दबाव आज भी महिलाओं को श्रम बाजार से बाहर कर रहे हैं।
गिग इकोनॉमी पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि इसे भविष्य का रोज़गार बताया जा रहा है, लेकिन वास्तव में यह असुरक्षा का नया रूप है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति: अमेरिका, ट्रंप और वेनेजुएल
अमरजीत कौर ने अपने भाषण में अमेरिका और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों की भी आलोचना की, खासकर वेनेजुएला में हस्तक्षेप को लेकर। उन्होंने कहा कि किसी भी संप्रभु देश के आंतरिक मामलों में दखल देना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
उन्होंने भारत से अपेक्षा की कि वह स्वतंत्र और न्यायपूर्ण विदेश नीति अपनाए।
ट्रेड यूनियन आंदोलन और लोकतंत्र का भविष्य
भाषण के अंतिम हिस्से में अमरजीत कौर ने ट्रेड यूनियन आंदोलन के भविष्य पर बात की। उन्होंने कहा कि यूनियनों को कमजोर करना दरअसल लोकतंत्र को कमजोर करना है।
उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि जब-जब ट्रेड यूनियन मज़बूत रहीं, तब-तब समाज में समानता और न्याय की मांग मज़बूत हुई।
कुल मिलाकर, अमरजीत कौर का यह भाषण श्रम कानूनों, मजदूरों की स्थिति, BJP-RSS की राजनीति और मोदी सरकार की नीतियों पर एक व्यापक और चुनौतीपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में सामने आता है।
यह भाषण न केवल ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं के लिए, बल्कि उन सभी नागरिकों के लिए महत्वपूर्ण है, जो भारत में लोकतंत्र और सामाजिक न्याय के भविष्य को लेकर चिंतित हैं।
✦ डिस्क्लेमर: यह लेख अमरजीत कौर के भाषण पर आधारित समाचार-विश्लेषण है। इसमें व्यक्त विचार वक्ता के हैं। ✦