ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर के निर्धारण को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बड़ा झटका दिया है। शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को केंद्र सरकार की संशोधन याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने अपने रुख को दोहराते हुए स्पष्ट किया कि ओबीसी क्रीमी लेयर का निर्धारण करते समय माता-पिता की वेतन से होने वाली आय को आधार नहीं बनाया जाएगा। इसके बजाय माता-पिता की सेवा संबंधी स्थिति और उनके पद को ध्यान में रखा जाएगा।
दरअसल, 11 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने ‘भारत सरकार बनाम रोहित नाथन’ मामले में ओबीसी नॉन-क्रीमी लेयर के निर्धारण को लेकर महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया था। अदालत ने कहा था कि क्रीमी लेयर का निर्धारण पूरी तरह आय आधारित नहीं, बल्कि पद और सामाजिक स्थिति आधारित होना चाहिए। इसके तहत माता-पिता किस सेवा वर्ग में हैं, जैसे ग्रुप ए, बी, सी या डी, यह महत्वपूर्ण होगा।
आमतौर पर माना जाता है कि सालाना 8 लाख रुपये से अधिक आय होने पर उम्मीदवार क्रीमी लेयर में आ जाता है। हालांकि, 1993 के मूल कार्यालय ज्ञापन के अनुसार, वेतन और कृषि से होने वाली आय को 8 लाख रुपये की सीमा की गणना से बाहर रखा गया है।
केंद्र सरकार ने फैसले को भविष्य से लागू करने की मांग की थी
सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार की संशोधन याचिका का मुख्य उद्देश्य 11 मार्च के फैसले को पिछली तारीख से लागू करने के बजाय भविष्य की तारीख से लागू करवाना था। सरकार ने दलील दी थी कि यदि फैसले को पिछली तारीख से प्रभावी किया गया तो वर्ष 2012 से अब तक हुई नियुक्तियों, सेवा आवंटन और वरिष्ठता सूचियों पर असर पड़ सकता है।
इसमें आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अधिकारियों के कैडर आवंटन में बदलाव की आशंका भी जताई गई थी। सरकार का कहना था कि इससे ऐसे कर्मचारियों पर भी असर पड़ेगा, जो इस मामले में पक्षकार नहीं हैं। साथ ही प्रशासनिक व्यवस्था में गंभीर परेशानी पैदा हो सकती है।
नई नीति बनाने के लिए मांगा था दो साल का समय
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों (पीएसयू), बैंकों और निजी क्षेत्र के पदों की तुलना सरकारी पदों से करने के लिए एक समान नीति तैयार करने हेतु दो साल का समय मांगा था। हालांकि, अदालत ने सरकार की इस मांग को भी स्वीकार नहीं किया और संशोधन याचिका खारिज कर दी।
याचिकाकर्ता के वकील वरुण ठाकुर ने मीडिया से बातचीत में कहा कि ओबीसी आरक्षण से जुड़ी विसंगतियों, विशेषकर क्रीमी लेयर और पीएसयू से संबंधित मुद्दों पर अदालत ने स्थिति फिर स्पष्ट कर दी है।
उन्होंने कहा कि 11 मार्च के फैसले में अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी थी कि क्रीमी लेयर का दर्जा तय करते समय वेतन और कृषि से होने वाली आय को नहीं गिना जाएगा। इसके बावजूद केंद्र सरकार ने फैसले को केवल भविष्य से लागू करने की मांग करते हुए याचिका दायर की थी।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से ओबीसी आरक्षण में क्रीमी लेयर के निर्धारण को लेकर एक बार फिर यह स्पष्ट हो गया है कि केवल माता-पिता की वेतन आय के आधार पर उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में नहीं रखा जा सकता।




