उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने कहा है कि अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की उल्लेखनीय प्रगति केवल देश की बड़ी उपलब्धि नहीं है, बल्कि ग्लोबल साउथ के देशों के लिए भी एक प्रेरणादायक मॉडल बनकर उभरी है। उन्होंने कहा कि भारत ने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में अपनी क्षमता और प्रतिबद्धता से दुनिया के सामने एक नई मिसाल पेश की है।
राष्ट्रीय राजधानी में आयोजित भारत रिन्यूएबल एनर्जी समिट एंड एक्सपो 2026 के समापन सत्र को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने बताया कि भारत की गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित बिजली क्षमता 300 गीगावाट के आंकड़े को पार कर चुकी है। भारत ने 2025 में ही अपनी कुल स्थापित बिजली क्षमता का 50 प्रतिशत गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों से हासिल कर लिया था। यह उपलब्धि निर्धारित समयसीमा से पांच साल पहले प्राप्त हुई।
उन्होंने कहा कि पिछले एक दशक में भारत की सौर ऊर्जा क्षमता 3 गीगावाट से भी कम स्तर से बढ़कर 170 गीगावाट से अधिक हो गई है। कभी कोयला आधारित बिजली की तुलना में कई गुना महंगी मानी जाने वाली सौर ऊर्जा आज देश के सबसे सस्ते ऊर्जा स्रोतों में शामिल है। यह बदलाव दूरदर्शी नीतियों, निजी क्षेत्र की भागीदारी और राज्यों तथा आम नागरिकों के सामूहिक प्रयासों का परिणाम है।
सौर ऊर्जा से जुड़ रहे लाखों परिवार और किसान
उपराष्ट्रपति ने पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके तहत 65 लाख से अधिक परिवार सौर ऊर्जा अभियान से जुड़ चुके हैं। इससे उन्हें सस्ती और स्वच्छ बिजली मिल रही है। वहीं, प्रधानमंत्री किसान ऊर्जा सुरक्षा एवं उत्थान महाभियान (पीएम-कुसुम) के तहत लगभग 30 लाख किसानों को लाभ पहुंचा है।
उन्होंने कहा कि सौर पंप किसानों का डीजल पर होने वाला खर्च कम कर रहे हैं और उन्हें अतिरिक्त आय के अवसर भी दे रहे हैं। इससे किसान केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि ऊर्जादाता भी बन रहे हैं।
दूरदराज के जनजातीय इलाकों तक पहुंच रही बिजली
सी.पी. राधाकृष्णन ने पीएम-जनमन और धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इन योजनाओं के माध्यम से उन दूरदराज के जनजातीय क्षेत्रों तक बिजली पहुंचाई जा रही है, जहां पारंपरिक बिजली ग्रिड स्थापित करना संभव नहीं है।
उन्होंने कहा कि बिजली तक पहुंच लोगों के जीवन में व्यापक बदलाव लाती है। इससे शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और रोजगार के अवसरों का विस्तार होता है। ऊर्जा समाधान तैयार करते समय शहरों, गांवों और दूरस्थ बस्तियों की अलग-अलग जरूरतों को ध्यान में रखना जरूरी है।
हाइड्रोजन ऊर्जा को लेकर जताया भरोसा
हाइड्रोजन ऊर्जा के क्षेत्र में हो रही प्रगति पर उपराष्ट्रपति ने विश्वास जताया कि विज्ञान और तकनीक में लगातार हो रहे विकास से आने वाले वर्षों में हाइड्रोजन ऊर्जा अधिक सुलभ और किफायती होगी।
उन्होंने कहा कि एक समय यह सवाल उठाया जाता था कि क्या भारत जैसा विशाल विकासशील देश जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करते हुए तेज आर्थिक विकास जारी रख सकता है। लेकिन पिछले एक दशक की उपलब्धियों ने इन आशंकाओं का जवाब दे दिया है।
उपराष्ट्रपति ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह दृष्टिकोण सही साबित हुआ है कि पर्यावरण के प्रति प्रतिबद्धता विकास में बाधा नहीं, बल्कि उसकी प्रेरक शक्ति है। इससे ऊर्जा की पहुंच बढ़ती है, उद्योगों की लागत कम होती है, रोजगार के अवसर पैदा होते हैं और आयात पर निर्भरता घटती है।
2040 की तकनीक के लिए आज अनुसंधान और नवाचार जरूरी
उद्योगों और शिक्षण संस्थानों के बीच बेहतर सहयोग पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि वर्ष 2040 की तकनीकें आज की प्रयोगशालाओं, स्टार्टअप्स और नवाचार केंद्रों से निकलेंगी। इसलिए अनुसंधान, नवाचार और उद्यमिता को प्राथमिकता देना समय की मांग है।
उपराष्ट्रपति ने अक्षय ऊर्जा परिवर्तन को जन आंदोलन बताते हुए कहा कि इसे केवल सरकार के प्रयासों से आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। इसके लिए शिक्षकों, विद्यार्थियों, उद्यमियों और आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।
उन्होंने कहा कि जनभागीदारी से अक्षय ऊर्जा का विस्तार तेज होगा, नए आर्थिक अवसर पैदा होंगे और रोजगार के साथ परिवारों की समृद्धि भी बढ़ेगी। भारत की हरित ऊर्जा यात्रा सामूहिक प्रयासों के जरिए विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।




