Monday, 31 August 2026
विचार

मोदी का इज़रायल दौरा: अपनी संसद से दूरी, दूर की संसद में आत्मविश्वास

Symbolic image of Narendra Modi with Israeli Parliament Knesset background
प्रतीकात्मक तस्वीर: इज़राइली संसद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

वाह मोदी जी, वाह। कुछ सौ मीटर की दूरी पर आपको अपनी खुद की संसद में जाने का साहस नहीं हो पाया। कारण कांग्रेस की कुछ तथाकथित उग्र महिला सांसदों का आपके लिए जबर्दश्त सुरक्षा घेरा रहने के बावजूद आप पर जानलेवा आक्रमण का भय।हालांकि, एक कारण यह भी बताया जा रहा है कि प्रतिपक्ष के नेता राहुल गांधी एक ऐसी किताब लहराने वाले थे जिससे आपकी घिग्घी बंध सकती थी। खैर, जो भी हो, इसके मूल में 56 इंच छाती में भारी भय का समा जाना एक प्रमुख कारण के रूप में साफ साफ दिख ही रहा है!

अब आप 3855 किलोमीटर की दूरी तय करके और लगभग 8 घंटे 36 मिनट का समय लगा कर इज़राइल जा रहे हैं। वहां जाकर आप जो कारामात करेंगे, उनमें एक प्रमुख है इज़राइल की संसद को संबोधित करना। लेकिन हाय री आपकी किस्मत! वहां भी आपके पहुंचने के पहले ही आपके भाषण के बहिष्कार का खतरा मंडरा गया है। इज़राइल की संसद (“कनेसट”) के कुछ मुख्य विपक्षी दलों ने यह चेतावनी दी है।

हालांकि इसका कारण भारत-इज़राइल रिश्तों के प्रति विरोध नहीं बल्कि इज़राइल के अंदरूनी राजनीतिक मुद्दों और शासकीय प्रोटोकॉल के उल्लंघन से जुड़ा है। बहिष्कार की मुख्य वजह इज़राइल की सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को आमंत्रित न करना है। पारंपरिक तौर पर संसद में किसी विदेशी अतिथि के सम्मान में होने वाले सत्र में उच्चतम न्यायालय के प्रमुख को भी बुलाया जाता है।

इस बार इज़राइल के सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष यित्ज़हाक अमित को इस कार्यक्रम में नहीं बुलाया गया, जिसका विपक्ष ने कड़ा विरोध किया है। विपक्ष का कहना है कि इससे स्थानीय न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अपमान और राजनीतिक खेल खेलने जैसा संदेश जाता है। उनका कहना है कि अगर इस प्रोटोकॉल का सम्मान नहीं किया गया तो वे मोदी का भाषण बहिष्कार करेंगे।

यह समय का संकेत है कि आज के युग में संसदों का महत्व उनकी भौगोलिक दूरी से तय होने लगा है। जो संसद पास है, वह असुविधाजनक है; जो दूर है, वह लोकतांत्रिक आदर्शों का मंच। और इस तरह, लोकतंत्र सुरक्षित नहीं होता—बस स्थानांतरित हो जाता है।

लोकतंत्र की आरामदेह संसदें और असुविधाजनक सवाल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक अनोखी संसदीय रणनीति विकसित कर ली है। अपनी ही संसद में विपक्ष के “आक्रमण” की आशंका से वे स्वयं पर संयम की एक लक्ष्मण-रेखा खींच लेते हैं, लेकिन हज़ारों किलोमीटर दूर जाकर एक मित्र राष्ट्र की संसद को संबोधित करने का साहस पूरे आत्मविश्वास के साथ दिखाते हैं। विडंबना यह है कि भारत की संसद में जहां सवाल पूछे जाते हैं, नारे लगते हैं और जवाब की मांग होती है—वहां जाना जोखिम भरा माना जाता है। पर कनेस्सेट में भाषण देना अपेक्षाकृत सुरक्षित है, भले ही वहां भी प्रमुख विपक्षी दल बहिष्कार की धमकी दे रहा हो। फर्क बस इतना है कि वह बहिष्कार विदेशी है—और विदेशी असहमति, घरेलू असहमति जितनी असहज नहीं लगती।

यह दृश्य अपने आप में लोकतंत्र का एक नया व्याकरण रचता है। अपने देश की संसद में विपक्ष “हमलावर” प्रतीत होता है, जबकि दूसरे देश की संसद में विरोध केवल “प्रोटोकॉल की औपचारिक कमी” भर बनकर रह जाता है। मानो लोकतंत्र का शोर तभी खतरनाक है, जब वह अपनी भाषा में हो।

यह भी एक संयोग है कि जिन संसदों में प्रश्नोत्तर की परंपरा मज़बूत होती है, वहां प्रधानमंत्री की उपस्थिति विरल होती जा रही है; और, जिन संसदों में सरकार और विपक्ष दोनों संकट में हों, वहां संबोधन एक अंतरराष्ट्रीय तमाशे का रूप ले लेता है। लोकतंत्र यहां संवाद नहीं, बल्कि मंच बन जाता है—और नेता अभिनेता।

इस पूरे प्रसंग में सबसे बड़ा व्यंग्य यह है कि प्रधानमंत्री मोदी उस विपक्ष से बचते फिरते हैं, जिसे उन्होंने वर्षों से “कमज़ोर” और “अप्रासंगिक” बताया है। अगर विपक्ष सचमुच इतना ही निरर्थक है, तो उससे डर किस बात का? और अगर डर है, तो विपक्ष और विपक्ष का नेता ‘सवा शेर’ साबित तो होता ही है!

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लेखक

सुमन्त

सुमन्त साहित्यिक, सांस्कृतिक तथा प्रगतिशील पत्रकारिता की धारा के एक समर्पित और प्रतिष्ठित नाम हैं। बिहार सहित देश की कई प्रमुख संस्थाओं और पत्र-पत्रिकाओं में सक्रिय भूमिका निभाते हुए उन्होंने सामाजिक सरोकारों को केंद्र में रखकर सतत लेखन किया है। गद्य और पद्य दोनों विधाओं में उनकी लेखनी समान रूप से प्रभावशाली रही है।
उन्होंने जनपक्षधर विचारों से संपन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे जनयुग, जनशक्ति, युवक धारा, ज्ञान-विज्ञान, रौशनाई, मैत्री-शांति, दिशा वाम तथा श्रम सरोकार आदि के संपादन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
दी आज़ादी (The Azadi) पर वे नियमित कॉलम के माध्यम से समाज, संस्कृति, लोकतंत्र और जनपक्षधर मुद्दों पर विचार प्रस्तुत करते हैं।

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