पटना: प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) और भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के संयुक्त तत्वावधान में प्रसिद्ध आलोचक, विचारक और जनपक्षधर लेखक वीरेंद्र यादव की स्मृति में पटना में एक श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर साहित्य, संस्कृति और सामाजिक आंदोलनों से जुड़े लेखक, रंगकर्मी, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और छात्र बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
सभा में वक्ताओं ने वीरेंद्र यादव को असहमति, लोकतांत्रिक विमर्श और जनपक्षधर आलोचना की सशक्त आवाज़ बताया। वक्ताओं का कहना था कि वीरेंद्र यादव का जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं है, बल्कि यह समकालीन आलोचना, प्रगतिशील साहित्य और सांस्कृतिक हस्तक्षेप के लिए एक बड़ी क्षति है।
जनपक्षधर आलोचना की परंपरा को आगे बढ़ाया
वक्ताओं ने कहा कि वीरेंद्र यादव ने साहित्य को सत्ता और वर्चस्व के केंद्र से बाहर निकालकर हाशिए के समाज, सबाल्टर्न जीवन और वंचित वर्गों के अनुभवों से जोड़ा। उनकी आलोचना केवल पुस्तकीय नहीं थी, बल्कि सामाजिक यथार्थ से गहराई से जुड़ी हुई थी।
श्रद्धांजलि सभा में इस बात पर जोर दिया गया कि आज के दौर में, जब असहमति की आवाज़ों को दबाने की कोशिशें बढ़ रही हैं, वीरेंद्र यादव जैसे आलोचकों की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
अनीश अंकुर ने साझा की यादें
बिहार प्रलेस के महासचिव अनीश अंकुर ने वीरेंद्र यादव के साथ बिताए समय को याद करते हुए कहा कि जब वे पटना आए थे, तब उन्होंने जनशक्ति भवन में ठहरकर इस स्थान को एक कम्यून की तरह बताया था।
उन्होंने कहा कि वीरेंद्र यादव प्रेमचंद की परंपरा को आगे बढ़ाने वाले लेखक थे, जिनके लेखन में समाज की जमीनी सच्चाइयाँ साफ दिखाई देती हैं।
अनीश अंकुर के अनुसार, वीरेंद्र यादव फुले और आंबेडकर को महज प्रतीक के रूप में नहीं, बल्कि आलोचनात्मक और वैचारिक दृष्टि से समझने के पक्षधर थे। उनका मानना था कि आलोचना का मूल उद्देश्य सत्ता से सवाल करना और समाज में वैचारिक चेतना को जीवित रखना है।

वर्चस्ववाद के खिलाफ मुखर हस्तक्षेप
बिहार विश्वविद्यालय में प्राध्यापक श्यामकिशोर ने कहा कि वीरेंद्र यादव हर तरह के वर्चस्ववाद के खिलाफ थे, चाहे वह साहित्य में हो, अकादमिक जगत में हो या सामाजिक संरचनाओं में।
उन्होंने कहा कि वीरेंद्र यादव ने आलोचना की उन दिशाओं को रेखांकित किया, जिनकी ओर पहले आलोचकों का ध्यान नहीं गया था।
श्यामकिशोर ने कहा कि वीरेंद्र यादव ने सबाल्टर्न जीवन की पीड़ाओं, संघर्षों और सवालों को आलोचना के केंद्र में रखा और आलोचना को एक सामाजिक हस्तक्षेप का औजार बनाया।
दलित-वंचित सवाल उनकी आलोचना के केंद्र में
बिहार प्रलेस के अध्यक्ष संतोष दीक्षित ने कहा कि दलित, वंचित और हाशिए पर खड़े समाज के प्रश्न वीरेंद्र यादव की आलोचना के मूल में रहे।
उन्होंने कहा कि वीरेंद्र यादव की भाषा बेहद सहज और संप्रेषणीय थी, जिससे आम पाठक भी उनकी आलोचनात्मक दृष्टि से जुड़ पाता था।
संतोष दीक्षित ने कहा कि उनकी आलोचना की वैचारिक जमीन मार्क्सवादी दृष्टिकोण से जुड़ी थी, लेकिन वह किसी एक खांचे में बंधी हुई नहीं थी।
लेखक के साथ-साथ एक सक्रिय एक्टिविस्ट
नाटककार रविंद्र भारती ने कहा कि वीरेंद्र यादव केवल लेखक या आलोचक नहीं थे, बल्कि वे एक सक्रिय एक्टिविस्ट की तरह काम करते थे।
उन्होंने सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलनों में निरंतर हस्तक्षेप किया और अपनी बात को निर्भीक और मुखर ढंग से रखा।
असहमति और संवाद की संस्कृति के पक्षधर
कवि अनिल विभाकर ने कहा कि वीरेंद्र यादव असहमति और संवाद की एक मजबूत आवाज़ थे।
वे किसी भी विषय पर अपनी स्पष्ट राय रखते थे, लेकिन उनकी असहमति हमेशा संवाद और बहस को आगे बढ़ाने वाली होती थी।
विवाद नहीं, वैचारिक हस्तक्षेप में विश्वास
‘प्राच्या प्रभा’ के संपादक विजय कुमार सिंह ने कहा कि वीरेंद्र यादव विवाद खड़ा करने के बजाय वैचारिक हस्तक्षेप में विश्वास रखते थे।
वे युवा लेखकों और आलोचकों के लिए एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाते थे।
सोशल मीडिया का सार्थक उपयोग
वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी सुशील कुमार ने कहा कि वीरेंद्र यादव विमर्श को जीवित रखने वाले लेखक थे।
उन्होंने फेसबुक जैसे सोशल मीडिया मंचों का भी वैचारिक और रचनात्मक उपयोग किया, जिससे बहस और संवाद का दायरा विस्तृत हुआ।
रचनाकारों के लिए प्रेरणास्रोत
संस्कृतिकर्मी अनिल अंशुमन ने कहा कि वीरेंद्र यादव नई पीढ़ी के रचनाकारों के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
उनका लेखन और सार्वजनिक हस्तक्षेप युवाओं को सवाल पूछने और सोचने के लिए प्रेरित करता है।
प्रगतिशील धारा के लिए बड़ी क्षति
बिहार विश्वविद्यालय में हिंदी की प्राध्यापिका सुनीता गुप्ता ने कहा कि इस दौर में वीरेंद्र यादव का जाना प्रगतिशील धारा के लिए अपूरणीय क्षति है।
उन्होंने कहा कि यह समय सत्ता और साहित्य के संघर्ष का है, और ऐसे समय में वीरेंद्र यादव जैसी आवाज़ों की आवश्यकता और भी अधिक थी।
इप्टा से रहा गहरा जुड़ाव
भारतीय जन नाट्य संघ (इप्टा) के महासचिव तनवीर अख्तर ने कहा कि वीरेंद्र यादव का इप्टा के साथ भी लंबा और गहरा जुड़ाव रहा।
उन्होंने कहा कि आमतौर पर लेखकों का नाट्य संगठनों से सीधा जुड़ाव नहीं होता, लेकिन वीरेंद्र यादव सभी कला विधाओं के आपसी संबंध को जरूरी मानते थे।
तनवीर अख्तर ने कहा कि आज के समय में प्रदर्शनकारी और सांस्कृतिक संगठनों में वैचारिक मजबूती के लिए वीरेंद्र यादव जैसे लोगों की भूमिका बेहद जरूरी है।
शोक संदेश और उपस्थिति
सभा को मनीष रंजन और विजयेंद्र ने भी संबोधित किया।
इप्टा के राष्ट्रीय महासचिव राकेश वेदा और सहारा अखबार के पूर्व संपादक दयाशंकर राय ने अपने शोक संदेश भेजे।
सभा का संचालन कवि चन्द्रबिन्द ने किया। कार्यक्रम में मणिभूषण, अजय पांडे, राजकुमार शाही, तपेश्वर, पुरुषोत्तम, राजेश कमल, अभिषेक कुमार सहित बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।
वक्ताओं ने एक स्वर में कहा कि वीरेंद्र यादव की वैचारिक विरासत को आगे बढ़ाना ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
वे अपने लेखन, आलोचना और असहमति के माध्यम से हमेशा साहित्य और समाज में याद किए जाते रहेंगे।