पटना: अखिल भारतीय प्रगतिशील महिला एसोसिएशन (ऐपवा) की ओर से 31 जुलाई 2025 को पटना के आईएमए हॉल में आयोजित कर्ज मुक्ति महिला सम्मेलन में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के कर्ज, ब्याज दरों और महिलाओं की आर्थिक स्थिति को लेकर चर्चा हुई। सम्मेलन में बिहार के अलग-अलग हिस्सों से आई महिलाओं ने कर्ज से जुड़ी अपनी परेशानियां साझा कीं और सरकार के सामने कई मांगें रखीं। कार्यक्रम में भाकपा-माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य, अर्थशास्त्री ज्यां द्रेज, सामाजिक कार्यकर्ता कल्पना विल्सन और ऐपवा की राष्ट्रीय महासचिव मीना तिवारी समेत कई वक्ताओं ने हिस्सा लिया।
सम्मेलन का मुख्य मुद्दा महिलाओं पर बढ़ते कर्ज के बोझ और माइक्रोफाइनेंस व्यवस्था से जुड़ी शिकायतें रहा। आयोजकों ने कर्ज को केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि महिलाओं के रोजगार, परिवार की आय और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ा सवाल बताया।
दीपंकर भट्टाचार्य ने कर्ज मुक्ति को राजनीतिक मुद्दा बनाने की मांग की
भाकपा-माले महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने सम्मेलन में कर्ज के सवाल को आगामी बिहार विधानसभा चुनाव के राजनीतिक विमर्श से जोड़ने की अपील की। उन्होंने कहा कि आम लोगों के कर्ज और रोजगार जैसे मुद्दों को चुनावी बहस का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
दीपंकर ने आरोप लगाया कि सरकारी नीतियों के कारण आम लोगों पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है और उन्हें कर्ज पर निर्भर होना पड़ रहा है। उन्होंने कर्ज के सवाल पर व्यापक अभियान चलाने की जरूरत बताई।
उनके मुताबिक, रोजगार, भोजन और आर्थिक सुरक्षा से जुड़े सवालों के समाधान के बिना केवल कर्ज उपलब्ध कराना महिलाओं और गरीब परिवारों की समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। सम्मेलन के दौरान उन्होंने कर्ज मुक्ति को आगामी विधानसभा चुनाव में प्रमुख मुद्दा बनाने की अपील की।
ज्यां द्रेज ने माइक्रोफाइनेंस की ब्याज दरों पर उठाए सवाल
अर्थशास्त्री और सामाजिक कार्यकर्ता ज्यां द्रेज ने बिहार और झारखंड में माइक्रोफाइनेंस कर्ज से जुड़ी समस्याओं का उल्लेख किया। उन्होंने दावा किया कि कुछ माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की ऊंची ब्याज दरों और कर्ज वसूली की प्रक्रिया से गरीब महिलाओं पर आर्थिक दबाव बढ़ रहा है।
द्रेज ने कहा कि कई मामलों में ब्याज पर ब्याज जुड़ने से कर्ज चुकाना मुश्किल हो जाता है। उन्होंने माइक्रोफाइनेंस संस्थाओं की निगरानी और जवाबदेही को लेकर भी सवाल उठाए। सम्मेलन से संबंधित प्रकाशित सामग्री में 35 से 40 प्रतिशत तक ब्याज दरों का दावा भी उनके वक्तव्य के संदर्भ में दर्ज है।
यहां ध्यान देने वाली बात यह है कि ये आंकड़े और आरोप सम्मेलन में वक्ताओं की ओर से रखे गए दावे हैं, इसलिए इन्हें माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र की सार्वभौमिक स्थिति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
मीना तिवारी ने 49,500 करोड़ रुपये के माइक्रोफाइनेंस पोर्टफोलियो का दावा किया
ऐपवा की राष्ट्रीय महासचिव मीना तिवारी ने सम्मेलन में बिहार के माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र के बढ़ते कर्ज का आंकड़ा सामने रखा। उनके अनुसार, बिहार में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों का कर्ज 2020 में करीब 6,000 करोड़ रुपये था, जो 2023 तक बढ़कर 49,500 करोड़ रुपये हो गया।
उन्होंने इस वृद्धि को महिलाओं पर बढ़ते कर्ज के बोझ से जोड़ते हुए माइक्रोफाइनेंस व्यवस्था में पारदर्शिता और नियमन की जरूरत बताई। यही 6,000 करोड़ से 49,500 करोड़ रुपये वाला आंकड़ा बाद की रिपोर्टिंग में भी मीना तिवारी के हवाले से प्रकाशित हुआ है।
मीना तिवारी ने आरोप लगाया कि ऊंची ब्याज दरों के कारण कई महिलाएं लगातार कर्ज चुकाने के दबाव में रहती हैं।
कल्पना विल्सन ने रोजगार और सम्मानजनक मजदूरी पर जोर दिया
सामाजिक कार्यकर्ता कल्पना विल्सन ने महिलाओं की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए केवल कर्ज उपलब्ध कराने के बजाय रोजगार और उचित मजदूरी पर जोर दिया।
उन्होंने माइक्रोफाइनेंस के उस मॉडल पर सवाल उठाया जिसमें गरीब महिलाओं की आय का बड़ा हिस्सा कर्ज की अदायगी में चला जाता है। उनका कहना था कि महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए स्थायी रोजगार और बेहतर मजदूरी की व्यवस्था जरूरी है।
महिलाओं ने साझा किए कर्ज से जुड़े अनुभव
सम्मेलन में शामिल महिलाओं ने माइक्रोफाइनेंस और स्वयं सहायता समूहों से जुड़े अपने अनुभव भी साझा किए। आयोजकों के अनुसार, कुछ महिलाओं ने कर्ज की किस्त और ब्याज चुकाने में आ रही परेशानियों का उल्लेख किया।
कार्यक्रम में महिलाओं की ओर से यह सवाल भी उठाया गया कि कम आय वाले परिवारों के लिए लगातार कर्ज की किस्त चुकाना किस तरह घरेलू खर्च, बच्चों की पढ़ाई और इलाज जैसी जरूरतों को प्रभावित करता है।
कर्ज से जुड़ी मानसिक और सामाजिक परेशानियों का मुद्दा भी सम्मेलन में सामने आया। हालांकि व्यक्तिगत अनुभवों को पूरे बिहार की महिलाओं की स्थिति का प्रतिनिधि आंकड़ा मानने के बजाय उन्हें सम्मेलन में सामने आई गवाहियों के रूप में देखना उचित होगा।
सम्मेलन में रखी गईं कई मांगें
सम्मेलन के दौरान महिलाओं के कर्ज और माइक्रोफाइनेंस व्यवस्था को लेकर कई मांगें रखी गईं। इनमें प्रमुख थीं:
- माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के लिए सख्त नियामक कानून बनाया जाए।
- कर्ज से जुड़ी आत्महत्या के मामलों में प्रभावित परिवारों को 20 लाख रुपये मुआवजा दिया जाए।
- पात्र महिलाओं को सरकारी बैंकों के माध्यम से 2 प्रतिशत ब्याज दर पर ऋण उपलब्ध कराया जाए।
- जीविका समूहों से जुड़ी महिलाओं के उत्पादों के लिए रोजगार और सरकारी खरीद की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
- जीविका कार्यक्रम का पंचायत स्तर पर स्वतंत्र सामाजिक अंकेक्षण (Social Audit) कराया जाए और उसके निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं।
गांव और पंचायत स्तर तक अभियान ले जाने की बात
सम्मेलन में कर्ज के सवाल को गांव और पंचायत स्तर तक ले जाने की बात भी कही गई। आयोजकों ने महिलाओं को संगठित कर कर्ज, वसूली और आर्थिक अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर जनसुनवाई और अभियान चलाने की बात कही।
इसका उद्देश्य महिलाओं की व्यक्तिगत कर्ज समस्याओं को सामूहिक मुद्दे के रूप में सामने लाना बताया गया।
कर्ज का सवाल रोजगार और सामाजिक सुरक्षा से भी जुड़ा
सम्मेलन में वक्ताओं की बातों से एक व्यापक सवाल सामने आया—क्या गरीब परिवारों की आय बढ़ाए बिना उन्हें लगातार ऋण उपलब्ध कराना आर्थिक समस्या का स्थायी समाधान हो सकता है?
आय, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक सुरक्षा जैसी जरूरतों के लिए कर्ज पर निर्भरता बढ़ने की स्थिति में कम आय वाले परिवारों पर किस्त और ब्याज का दबाव बढ़ सकता है। सम्मेलन के वक्ताओं ने इसी संदर्भ में महिलाओं के लिए रोजगार, उचित मजदूरी और सार्वजनिक सेवाओं को मजबूत करने पर जोर दिया।
पटना में आयोजित कर्ज मुक्ति महिला सम्मेलन में महिलाओं के कर्ज और माइक्रोफाइनेंस व्यवस्था को लेकर आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक तीनों स्तरों पर सवाल उठाए गए। सम्मेलन में रखी गई मांगों में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के नियमन से लेकर कम ब्याज पर ऋण, रोजगार, सरकारी खरीद और सामाजिक ऑडिट तक के मुद्दे शामिल रहे।
सम्मेलन में वक्ताओं ने कर्ज की समस्या को महिलाओं की आर्थिक स्वतंत्रता और सम्मानजनक जीवन से जोड़ते हुए इसे व्यापक सामाजिक-राजनीतिक अभियान का मुद्दा बनाने की बात कही।




