कर्ज के खिलाफ बिहार बोलेगा: पटना में महिलाओं का जोरदार सम्मेलन

महान कथाकार प्रेमचंद की जयंती के अवसर पर पटना के IMA हॉल में आयोजित कर्ज़ मुक्ति महिला सम्मेलन ने बिहार की राजनीतिक फिज़ा में एक नई बहस छेड़ दी है। सम्मेलन में राज्यभर से आईं सैकड़ों महिलाओं ने अपने कर्ज़ की पीड़ा साझा की और सरकार से न्याय की मांग की।

कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के तौर पर शामिल हुए भाकपा (माले) महासचिव दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि “कर्ज़ अब केवल आर्थिक मुद्दा नहीं रहा, यह राजनीतिक सवाल बन चुका है।” उन्होंने मांग की कि आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में कर्ज़ मुक्ति को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया जाए।

दीपंकर ने कहा,

“सरकार की नीति ही बन चुकी है कि लोगों को कर्ज में धकेल दो, ताकि वे अपने हक की बात न कर सकें। यह कैसा मज़ाक है कि लोग रोटी और रोज़गार के लिए मर रहे हैं और सरकार ‘शिव चर्चा’ और ‘SIR’ में व्यस्त है।”

ज्यां ड्रेज बोले: “कर्ज अब मुसीबत नहीं, मौत बन गया है”

सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रसिद्ध अर्थशास्त्री ज्यां ड्रेज ने बताया कि बिहार और झारखंड में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की बेतरतीब लोन व्यवस्था और ऊंची ब्याज दरों ने लाखों महिलाओं को आर्थिक गुलामी में धकेल दिया है।

“ब्याज पर ब्याज और उसके ऊपर फिर ब्याज — ये शोषण नहीं तो क्या है? RTI से भी इन कंपनियों की जानकारी नहीं मिलती। न निगरानी है, न जवाबदेही।”

मीना तिवारी का खुलासा:

49,500 करोड़ का कर्ज, लेकिन महिलाओं को मिला शोषण

ऐपवा की राष्ट्रीय महासचिव मीना तिवारी ने बताया कि बिहार में माइक्रोफाइनेंस कंपनियों का कर्ज़ 2020 में ₹6,000 करोड़ था, जो 2023 तक बढ़कर ₹49,500 करोड़ हो गया। उन्होंने कहा कि

“35% से 40% तक चक्रवृद्धि ब्याज वसूला जा रहा है। ये न सिर्फ शोषण है बल्कि एक सुनियोजित जाल है जिससे महिलाओं को फँसाया जा रहा है।”

कल्पना विल्सन ने कहा:

“महिलाओं को कर्ज नहीं, रोज़गार दीजिए”

अंतरराष्ट्रीय सामाजिक कार्यकर्ता कल्पना विल्सन ने मांग की कि

“माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के शिकारी मॉडल पर तुरंत रोक लगे। महिलाओं को सशक्त बनाना है तो उन्हें सम्मानजनक रोज़गार और मज़दूरी दीजिए, कर्ज नहीं।”

पीड़ित महिलाओं की गवाही:

“ब्याज में चली जाती है सारी कमाई, ज़िंदगी तबाह हो गई”

सम्मेलन में कई महिलाएं जीविका समूह, एनआरएलएम और माइक्रोफाइनेंस एजेंसियों से जुड़े अनुभवों को साझा करते हुए भावुक हो गईं। एक महिला ने कहा,

“हर महीने की कमाई ब्याज में चली जाती है। बच्चों की पढ़ाई रुक गई, इलाज नहीं हो पाता, और अब तो आत्महत्या की सोच आती है।”

प्रेमचंद की विरासत से प्रेरणा:

“कर्ज़ का सवाल अब नई क्रांति लाएगा”

वक्ताओं ने प्रेमचंद के उपन्यास गोदान और निर्मला के उदाहरण देते हुए बताया कि कैसे कर्ज़ ने महिलाओं की पीढ़ियों को तोड़ा है। वंदना प्रभा ने कहा कि

“समय आ गया है कि हम साहित्य से सीख लेकर सामाजिक आंदोलन में बदल दें।”

प्रस्ताव पारित:

सम्मेलन में निम्न प्रस्ताव पारित किए गए—

  1. कर्ज़ नियंत्रण पर सख्त कानून: माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के संचालन पर नियंत्रण और पारदर्शिता के लिए बिहार सरकार कानून बनाए।
  2. पीड़ितों को मुआवज़ा: आत्महत्या करने वालों के परिवारों को ₹20 लाख की मुआवजा राशि दी जाए।
  3. 2% ब्याज पर लोन: सरकारी बैंक से पात्र महिलाओं को 2% ब्याज पर ऋण मिले।
  4. रोज़गार और उत्पाद खरीद की गारंटी: जीविका समूह से जुड़ी महिलाओं को रोजगार मिले और उनके उत्पादों की सरकारी खरीद सुनिश्चित हो।
  5. सोशल ऑडिट: जीविका कार्यक्रम का पंचायत स्तर पर स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए।

अब गाँव-गाँव होगा अभियान:

1 अगस्त से भाकपा (माले) ‘बूथ चलो अभियान’ के तहत कर्ज़ पीड़ित महिलाएं बूथ स्तर पर जन सुनवाई करेंगी और अपने नाम वोटर लिस्ट में जांचेंगी।

पटना से उठी ये आवाज़ अब पूरे बिहार में गूंजेगी। कर्ज़ के खिलाफ महिलाओं का यह संगठित विरोध बताता है कि मुद्दा सिर्फ पैसा नहीं है, बल्कि आर्थिक न्याय और गरिमा का है। आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ‘सुदखोर बिहार छोड़ो’ का नारा बदलाव की इबारत लिखेगा।

Posted by Abhishek Kumar

Journalist