का. पी. सी. जोशी के जन्मदिन पर मुझे बरबस ऐतिहासिक गांधी-जोशी पत्र व्यवहार की याद आ जाती है। इस पत्राचार के जरिये हम पाते हैं कि का. जोशी उस समय के भारतीय राजनीतिक रंगमंच की सबसे ताकतवर शख्सियत गांधी से किस नैतिक बल से मुठभेड़ करते हुए महात्मा से अंततः अपनी पार्टी के ‘बेदाग’ होने की स्वीकृति भी पा लेते हैं। भारतीय राजनीति के इतिहास में कुछ प्रसंग ऐसे हैं जो केवल अतीत का दस्तावेज नहीं, बल्कि वर्तमान के लिए एक असहज आईना भी हैं। का. पी. सी. जोशी और महात्मा गांधी के बीच हुआ पत्राचार ऐसा ही एक प्रसंग है – जहाँ आरोप थे, संदेह थे, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण था सत्य के प्रति आग्रह और सार्वजनिक जीवन की नैतिकता का आग्रह। कम्युनिस्ट पार्टी के तत्कालीन महासचिव का. पी. सी. जोशी (1935–1947) तथा महात्मा गांधी के बीच 1940 के दशक में पत्राचार हुआ था। यह पत्राचार मुख्यतः कम्युनिस्ट पार्टी की नीतियों विशेषकर द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उसके रुख, और उसके वित्तीय स्रोतों को लेकर उठे संदेहों के संदर्भ में था। उस समय यह आरोप लगाया जा रहा था कि कम्युनिस्ट पार्टी को बाहरी (विशेषकर सोवियत या अन्य) स्रोतों से धन मिल रहा है। गांधीजी ने इन आरोपों को गंभीरता से लिया और का. पी. सी. जोशी से स्पष्टीकरण मांगा। जोशी ने विस्तार से जवाब दिया और पार्टी के वित्तीय स्रोतों का बड़े साहस के साथ खुलासा किया। यह “गांधी-जोशी पत्र व्यवहार” के नाम से इतिहास में दर्ज है। गांधी ने सुनी-सुनायी बातों को अंतिम सत्य नहीं माना था। उन्होंने सीधे प्रश्न किया। जोशी ने बचाव में चुप्पी नहीं साधीं। उन्होंने विस्तार और अकाट्य प्रमाण के साथ उत्तर दिया। और जब स्पष्टीकरण संतोषजनक लगा, तो गांधी ने अपने संदेहों को आगे नहीं बढ़ाया। व्यावहारिक रूप से उन्होंने यह स्वीकार किया कि बिना ठोस प्रमाण के आरोपों को आगे बढ़ाना उचित नहीं है। मतलब, वह कम्युनिस्ट पार्टी को उस मामले में दोषी ठहराने का रत्ती भर सबूत भी नहीं पा सकें। इस अर्थ में गांधी-जोशी पत्राचार केवल “फंड कहाँ से आया” का तकनीकी सवाल नहीं था, बल्कि राजनीतिक नैतिकता (political morality) का सवाल था; जनविश्वास (public trust) का सवाल था। और, सबसे महत्वपूर्ण – पारदर्शिता (transparency) का सवाल था। यह संवाद “राजनीतिक शुचिता की संस्कृति” का उदाहरण था। यह केवल दो बड़े व्यक्तित्व के बीच संवाद नहीं था – यह उस दौर की राजनीति का उच्चतर नैतिक व्याकरण था। लेकिन आज, जब हम चारों ओर देखते हैं तो राजनीति का यह व्याकरण लगभग लुप्तप्राय प्रतीत होता है। चुनावी चंदे की अपारदर्शी संरचनाएँ, कॉर्पोरेट-राजनीति गठजोड़ और वैधता की आड़ में नैतिकता का क्षरण – ये सब मिलकर एक ऐसे तंत्र का निर्माण कर चुके हैं जहाँ जवाबदेही एक औपचारिकता भर रह गयी है। आरोप अब सत्य की खोज के लिए नहीं, बल्कि प्रतिद्वंद्वी को ध्वस्त करने के औजार बन चुके हैं। ऐसे में यह गांधी-जोशी पत्र व्यवहार एक असहज प्रश्न की तरह सामने आता है : क्या आज की राजनीति उस नैतिक कसौटी पर खरा उतरने की कल्पना भी कर सकती है? परंतु, इस प्रश्न का एक पक्ष और भी है – और, वह स्वयं कम्युनिस्ट पार्टियों के लिए बड़ा ही असहज है। यदि, एक समय वह भी था जब भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और व्यापक कम्युनिस्ट आंदोलन ने कभी इस उच्चतर नैतिक मानदंड को जिया तो आज वही धारा भारतीय राजनीति में अपनी सबसे कमजोर अवस्था में क्यों है? यहां केवल राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पूंजी के “षड्यंत्र” या बुर्जुआ सरकारों के “दमन” का तर्क पर्याप्त नहीं है। समस्या अधिक जटिल और आत्मालोचनात्मक है। मेरी समझ से इसके कुछ प्रमुख और ज्वलंत कारक हैं जिन्हें यहां रेखांकित किया जाना उचित है। पहला, कम्युनिस्ट पार्टी ने जन संघर्षों की श्रृंखलाबद्ध सफलताओं के साथ नैतिकता की उच्चतर पैमाना पेश कर अपनी पहचान तो बनायी। परंतु, अपने इस हासिल – संघर्षशीलता, उच्चतर नैतिकता – को बहुसंख्य जनता में ले जाकर व्यापक स्वीकृति पाने अथवा राजनीतिक संप्रेषण में उसे स्थापित करने में क्रमश: पीछे पड़ती चली गयी। बदलते सामाजिक यथार्थ – नयी आकांक्षाएं, पहचान की राजनीति, और सांस्कृतिक विमर्श – इन सबके साथ उसका संवाद कमजोर पड़ता गया। दूसरा, संगठनात्मक स्तर पर भी भारी जड़ता आयी है। जहाँ एक समय का. पी. सी. जोशी जैसा अद्वितीय कल्पनाशील, समय और समाज की नब्ज को पकड़ने वाला नेता जन-सांस्कृतिक आंदोलनों से गहरे जुड़ा था, वहीं बाद के दौर में कम्युनिस्ट पार्टियों की नेतृत्वकारी जमात रूढ़ और औपचारिक संस्थागत ढाँचों में स्वयं को और पूरे आंदोलन को कैद करते चली गयी। स्वभावत:, जनाधार में भारी गिरावट दरपेश है। तीसरा, वैश्विक स्तर पर भी समाजवाद और कम्युनिज़्म की वैचारिक सुदृढ़ता को 20वीं सदी के उत्तरार्ध में गहरे संकटों का सामना करना पड़ा। उसका प्रभाव भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन पर भी पड़ा – चाहे वह वैचारिक विचलन/भ्रम हो या रणनीतिक पुनर्संयोजन की विफलता। इसके अलावा भी अन्य कारक हैं जिन पर गहरे विमर्श की आवश्यकता है। मगर, इसका अर्थ यह नहीं कि गांधी-जोशी पत्र व्यवहार आज के समय में अप्रासंगिक हो गया है। बल्कि, विडंबना यह है कि जितना वह आज की राजनीति में अनुपस्थित है, उतना ही वह आवश्यक भी है। आज जब राजनीतिक दलों के बीच “कौन कितना अनैतिक यानी अपारदर्शी है” दिखने की होड़ मची हुई है, तब वह पत्राचार हमें याद दिलाता है कि राजनीति का एक वैकल्पिक नैतिक मार्ग भी संभव था। और, शायद अब भी है। निष्कर्षतः, गांधी-जोशी पत्राचार हमें दो परस्पर विरोधी लेकिन पूरक सबक देता है : एक ओर जहां वह राजनीति में नैतिकता और पारदर्शिता की अनिवार्यता को रेखांकित करता है तो दूसरी ओर, यह चेतावनी भी देता है कि यदि नैतिकता को जीवंत राजनीतिक रणनीति और जनसंपर्क से नहीं जोड़ा जाये तो वह इतिहास का गौरव तो बन सकती है, वर्तमान की शक्ति नहीं। आज जब हम का. पी. सी. जोशी को उनके जन्मदिन पर याद करते हैं तो हमें उनके चित्र पर महज माल्यार्पण नहीं, बल्कि उनकी महान विरासत में अपने को ढालने की शपथ लेने की जरूरत है। जन्मदिन पर उन्हें क्रांतिकारी सलाम।
यह लेख सुमन्त द्वारा लिखित है और इसे मूल रूप में प्रकाशित किया गया है।
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