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बेगूसराय संसदीय क्षेत्र के दिलचस्प मुकाबले में कौन हैं बेहतर दावेदार

(कभी ‘बिहार के मास्को’ और ‘लेनिनग्राड’ के नाम से जाना जाने वाला यह ज़िला लोकसभा-चुनाव,2019 में ‘मिनी भारत’ में तब्दील होकर हिन्दुत्व का गढ़ बन चुका है।)

बेगूसरायनामा 2.0: पार्ट 1

कुमार सर्वेश।

बेगूसराय ही नहीं, पूरा देश लोकसभा चुनाव,2024 के मुहाने पर खड़ा है। ऐसी स्थिति में अपनी जड़ और ज़मीन से जुड़ा मन खुद-ब-खुद राजनीति की ओर खिंचा चला आता है। और, तब खुद को नियंत्रित कर पाना और भी मुश्किल है, जब बात बेगूसराय की हो। ग़ज़ब का आकर्षण है इस ज़िले में। कभी ‘बिहार के मास्को’ और ‘बिहार के लेनिनग्राड’ के नाम से जाना जाने वाला यह ज़िला लोकसभा-चुनाव,2019 में ‘मिनी भारत’ में तब्दील होकर हिन्दुत्व का गढ़ बन चुका है। उस समय भाजपा और संघ की प्रतिष्ठा दाँव पर लगी हुई थी। अन्ततः सब कुछ झोंकने के बाद भाजपा और संघ अपनी साख बचाने में सफल ही नहीं रहे, वरन् उन्होंने अपने विरोधियों को रौंद दिया। लेकिन, उसकी इस जीत में भाजपा-विरोधी वोटों के विभाजन और लेफ़्ट उम्मीदवार कन्हैया कुमार की राजनीतिक अपरिपक्वता के साथ-साथ राजद उम्मीदवार तनवीर हसन की जीत से आशंकित हिन्दुओं ने अहम् भूमिका निभायी। लेकिन, इस बार बेगूसराय संसदीय क्षेत्र का राजनीतिक परिदृश्य बदला हुआ है। इस बार विपक्ष एकजुट है, और ऐसी स्थिति में बेगूसराय की फ़तह आसान नहीं होने जा रही है।

बेगूसराय संसदीय क्षेत्र में एक ओर एनडीए गठबंधन और भाजपा की ओर से केन्द्रीय मंत्री एवं वर्तमान सांसद गिरिराज सिंह, राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा और लोजपा से जहानाबाद से पूर्व सांसद अरूण कुमार की दावेदारी सामने आ रही है, तो महागठबंधन की ओर से सीपीआई के पूर्व सांसद शत्रुघ्न प्रसाद सिंह, पूर्व विधायक अवधेश राय और उषा साहनी की दावेदारी सामने आ रही है। अब देखना यह कि आने वाले दिनों में बेगूसराय की राजनीति कौन-सी करवट लेती है।

भाजपा की राह:

बेगूसराय में भाजपा की ओर से दो दावेदार हैं: वर्तमान सांसद एवं केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह और राज्यसभा सांसद राकेश सिन्हा। ऐसा माना जा रहा है (और प्रधानमंत्री मोदी के बेगूसराय दौरे से इस बात के पर्याप्त संकेत भी मिलते हैं) कि गिरिराज सिंह भाजपा के शीर्ष नेतृत्व की पहली पसन्द हैं। लेकिन, सूत्रों से इस बात के संकेत मिलते हैं कि राकेश सिन्हा न केवल संघ की पहली पसन्द हैं, वरन् संघ ने इस सन्दर्भ में उन्हें आश्वस्त करते हुए चुनावी तैयारी का निर्देश भी दे रखा है। इस तरह बेगूसराय संसदीय सीट को लेकर न केवल संघ और भाजपा की सोच अलग-अलग है, वरन् राकेश सिन्हा और गिरिराज सिंह के बीच पिछले कुछ वर्षों से जो घमासान मचा हुआ है, बेगूसराय के भाजपा कैडर दोनों के बीच पिस रहे हैं, या फिर यूँ कह लें, कि वे इस घमासान का लुत्फ़ उठा रहे हैं। दोनों की अपनी सीमाएँ हैं और दोनों कुछ लोगों तक सिमटे हुए हैं। उनके दायरे से निकलने के लिए तैयार नहीं। कुछ समय पहले तक राकेश सिन्हा की दावेदारी मज़बूत मानी जा रही थी, लेकिन लाखो और बड़ी बलिया की घटना के दौरान वर्तमान सांसद ने ज़बरदस्त वापसी की है। उसके बाद से उनका पलड़ा भारी लग रहा है। लेकिन, जिस तरह हाल में बेगूसराय में भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा गिरिराज सिंह का खुलकर विरोध किया गया और इससे सम्बंधित वीडियो वायरल हुआ, वह अनायास नहीं है। ऐसा लगता है कि यह विरोध प्रायोजित है और इस विरोध का सम्बंध बेगूसराय भाजपा की आन्तरिक खींच-तान से है। इस विरोध के मूल में गिरिराज सिंह बनाम् राकेश सिन्हा के विवाद के साथ-साथ संघ बनाने भाजपा की विवाद भी मौजूद है। वैसे, मुझे ऐसा लगता है कि गिरिराज सिंह की तुलना में राकेश सिन्हा की उम्मीदवारी बेगूसराय के हक़ में भी है और बेगूसराय की मर्यादा के अनुरूप भी। लेकिन, यह भी सच है कि आज के सामाजिक-राजनीतिक परिवेश राकेश सिन्हा की तुलना में गिरिराज सिंह के कहीं अधिक अनुकूल है, गिरिराज लोगों के माइंडसेट के कहीं अधिक क़रीब हैं और मोदी-शाह की राजनीति में भी कहीं अधिक फ़िट बैठते हैं। इतना ही। हूँ, गिरिराज सिंह में और चाहे जितनी कमियाँ हों, लेकिन उनके पास ज़मीनी राजनीति का अनुभव है और यह राकेश सिन्हा, जिनके पास ज़मीनी राजनीति का अनुभव नहीं है, की तुलना में गिरिराज सिंह को बढ़त की स्थिति में ले जाता है। राकेश सिन्हा की सक्रियता मूलतः बौद्धिक धरातल पर रही है और वे संघ के सहारे ज़मीनी राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने की कोशिश कर रहे हैं। इसीलिए राकेश सिन्हा की तुलना में गिरिराज सिंह के जीतने की संभावना भी कहीं ज़्यादा है।

महागठबंधन की राह:

इस बात की पूरी संभावना है और यह लगभग कन्फर्म है कि बेगूसराय सीट महागठबंधन के घटक दल भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के खाते में जाए। लेकिन, पिछले लोकसभा-चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार कन्हैया कुमार के काँग्रेस में शामिल होने के बाद से लेफ़्ट को ज़बरदस्त झटका लगा है, और उससे उबर पाना लेफ़्ट के लिए आसान नहीं है। वर्तमान में लेफ़्ट की ओर से तीन दावेदार सामने हैं: पूर्व सांसद शत्रुघ्न प्रसाद सिंह, पूर्व विधायक अवधेश राय और पूर्व विधान पार्षद उषा साहनी। इसके अलावा, गाहे-बगाहे वर्तमान विधायक राम रतन सिंह की भी चर्चा होती है, पर उनकी दावेदारी कमजोर है और उन्हें गम्भीरता से नहीं लिया जा रहा है।
जहाँ तक शत्रुघ्न बाबू की दावेदारी का प्रश्न है, तो कई बातें उनके पक्ष में जाती हैं। जैसे: वे उस भूमिहार समुदाय से आते हैं जिसका इस क्षेत्र की राजनीति में वर्चस्व रहा है और जिसकी संख्या इस संसदीय क्षेत्र में सबसे ज़्यादा है। इतना ही नहीं, लम्बे समय से वे शिक्षक संघ की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने कई बार लोकसभा चुनाव लड़ा है और वे यहाँ के सांसद भी रहे हैं। उनके पास ज़मीनी राजनीति का अनुभव है। उनकी अपील ‘एक्रॉस द पार्टी लाइन’ है। साथ ही, उनके लिए संसाधनों को जुटाना भी आसान होगा। लेकिन, उनके कुछ स्याह पक्ष भी हैं। उनकी उम्र उनकी दावेदारी को कमजोर करती है। पार्टी और विचारधारा के प्रति उनकी निष्ठा भी सन्देह से परे नहीं है, और इसको लेकर लगातार प्रश्न उठते रहे हैं। इतना ही नहीं, सम्प्रदायीकरण और उग्र हिन्दुत्व के इस दौर में, जब भूमिहार समुदाय पूरी निष्ठा के साथ भाजपा के साथ खड़ा है और उसने भूमिहार उम्मीदवार दे रखा है, ऐसे में वे भूमिहार मतदाताओं के रुझानों को प्रभावित कर पायेंगे , या फिर उन्हें उनका निर्णायक समर्थन मिलेगा, इसमें सन्देह है।
इस सन्दर्भ में उनकी तुलना में अन्य दावेदारों की स्थिति थोड़ी बेहतर है। अवधेश राय पूर्व विधायक रहे हैं। उनके पास ज़मीनी राजनीति का अनुभव है। पार्टी संगठन पर भी उनकी मज़बूत पकड़ भी है। वे व्यवहार कुशल हैं। वे यादव समुदाय से आते हैं, लेकिन पिछड़ों के बीच उनकी अच्छी पैठ है। लेकिन, उनके साथ समस्या यह है कि उनकी राजनीति आक्रामक रही है और उनकी छवि सवर्ण-विरोधी रही है। ऐसे परिदृश्य में उनकी उम्मीदवारी की स्थिति में सीपीआई के पारम्परिक सवर्ण वोटरों के छिटकने के ख़तरे को भी ख़ारिज नहीं किया जा सकता है। इतना ही नहीं, उन्हें भूमिहार कैडरों का खुलकर सहयोग मिल पायेगा, इसमें सन्देह है।
इन दोनों: शत्रुघ्न बाबू और अवधेश राय की तुलना में उषा साहनी की स्थिति थोड़ी बेहतर है और वे बेहतर विकल्प हो सकती हैं। वे महिला हैं और लो-प्रोफ़ाइल रहती हैं। साथ ही, चूँकि वे विधान पार्षद रह चुकी हैं, इसीलिए उनके पास ज़मीनी राजनीति का अनुभव भी है, यद्यपि इस मामले में उनकी स्थिति शत्रुघ्न बाबू और अवधेश राय के सापेक्ष कमजोर है। लेकिन, इन सबसे इतर जो चीज उनके पक्ष में जाती है, वह यह कि वे ईबीसी समुदाय से आती हैं। ऐसी स्थिति में उनकी उम्मीदवारी ईबीसी समुदाय के साथ-साथ महादलितों को साधने में मददगार साबित हो सकती है। एक नेत्री के रूप में उनकी छवि उदार रही है और उनकी यह छवि भूमिहार वोटरों को बिदकने से रोकने में भी सक्षम है। लेकिन, उनका महिला होना समस्याजनक हो सकता है और उनकी भूमिहार न होना कई स्तरों पर समस्याओं को जन्म दे सकता है। साथ ही, चुनाव लड़ने के लिए संसाधनों को जुटा पाना उनके लिए आसान नहीं होने जा रहा है। इस मामले में शत्रुघ्न बाबू और अवधेश राय बढ़त की स्थिति में हैं। पर, उनके सहारे सीपीआई अपने उस पारम्परिक वोटबैंक को साधने में सफल हो सकती है जो 1990 के दशक और उसके बाद सामाजिक न्याय की राजनीति और हिन्दुत्ववादी राजनीति की लहर में उससे छिटकता चला गया। उनकी उम्र भी उनके पक्ष में है और जीत-हार से परे यदि बेगूसराय में लेफ़्ट के बेहतर भविष्य को सुनिश्चित करना है, तो उनकी भूमिका निर्णायक हो सकती है।

अब देखना यह कि आने वाले दिनों में बेगूसराय की राजनीति कौन-सी करवट लेती है, उसका रूख क्या होगा और किधर होगा, यह तो एनडीए और महागठबंधन द्वारा उम्मीदवारों की औपचारिक घोषणा के बाद ही स्पष्ट होगा, पर इतना तो तय है कि बेगूसराय संसदीय क्षेत्र की राह दोनों गठबंधनों के लिए आसान नहीं होने जा रही है।

यह लेखक की निजी राय है।

कुमार सर्वेश

लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं। बिहार की राजनीति में उनकी गहरी रुचि है।

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