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हरिशंकर परसाई जन्मशताब्दी आयोजन के लिए लोगों का उत्साह ने शीतलहर को किया पराजित

बेगूसराय ज़िला प्रगतिशील लेखक संघ की ओर से कर्मयोगी सभागार, बेगूसराय में महान व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई जन्म शताब्दी आयोजन किया गया जिसमें ‘विकलांग श्रद्धा के दौर और हरिशंकर परसाई’ विषय पर संगोष्ठी का आयोजन ज़िला अध्यक्ष एवं भूतपूर्व प्राचार्य डा॰सीताराम प्रभंजन की अध्यक्षता में हुआ।

संगोष्ठी में ‘विकलांग श्रद्धा के दौर और हरिशंकर परसाई’ विषय पर विषय प्रवेश अ॰भा॰प्रगतिशील लेखक संघ के पूर्व महासचिव, लेखक एवं पूर्व विधायक राजेन्द्र राजन ने किया।उन्होंने साहित्य में व्यंग्य विधा को अपनाया।इनकी व्यंग्य ने करूणा पैदा किया जहाँ करूणा क्रांति पैदा करती है।आज हिन्दुस्तान में लोकतांत्रिक व्यवस्था चरमरा गयी।फासीवाद और साम्प्रदायिकता को छद्म लड़ाई से नहीं पराजित किया जा सकता है बल्कि आपने-सामने लड़कर किया जा सकता है।हरिशंकर परसाई पर आर॰एस॰एस॰ द्वारा हमलों का ज़िक्र किया और किस प्रकार जबलपुर में पाँच हज़ार मज़दूरों ने इस घटना के विरोध में जुलूस निकाला।आज बुद्धिजीवियों को सत्ता द्वारा तमाम तंत्रों पर हमला के खिलाफ लड़ाई में सड़क पर आना होगा।वर्षों पहले लेख ‘विकलांग श्रद्धा के दौर में’ लिखे इन पंक्तियों को उन्होंने दोहराया, “श्रद्धा पुराने अख़बार की तरह रद्दी में बिक रही है।विश्वास की फसल को तुषार मार गया।इतिहास में शायद कभी किसी जाति को इस तरह श्रद्धा और विश्वास से हीन नहीं किया गया होगा।जिस नेतृत्व पर श्रद्धा थी ,उसे नंगा किया जा रहा है।जो नया नेतृत्व आया है,वह उतावली में अपने कपड़े खुद उतार रहा है।कुछ नेता तो अंडरवियर में ही हैं।क़ानून से विश्वास गया।अदालत से विश्वास छीन लिया गया।बुद्धिजीवियों की नस्ल पर ही शंका की जा रही है।डाक्टरों को बीमारी पैदा करनेवाला सिद्ध किया जा रहा है।कहीं कोई श्रद्धा नहीं,विश्वास नहीं।

अपने श्रद्धालुओं से कहता चाहता हूँ —“यह चरण छूने का मौसम नहीं, लात मारने का मौसम है। मारो एक लात और क्रांतिकारी बन जाओ।” ये पंक्तियाँ आज भी प्रासंगिक है।

इस संगोष्ठी के मुख्य वक्ता बी॰एच॰यू॰ के हिंदी विभाग के पूर्व अध्यक्ष एवं लेखक डा॰अवधेश प्रधान हरिशंकर परसाई के लिखे कई उद्धरणों की चर्चा करते हुए करते हुए कहा कि परसाई जी आज़ादी के बाद सबसे ज़्यादा पढ़े जाने वाले लेखकों में एक हैं।परसाई आजीवन व्यक्ति और उसके सामाजिक संदर्भों दिखने वाली किसी भी विसंगति पर कुठाराघात करते रहे।उन्होंने व्यक्ति-जीवन की विडंबनाओं का एक ऐसा रेखाचित्र खींचा जिसे पढ़कर एक चेतन पाठक अपने आप से भी सवाल उठाने पर विवश हो जाता है।समाज में फैले भ्रष्टाचार,दिखावा, दोगलापन और अफसरशाही पर हरिशंकर परसाई के जो व्यंग्य ‘निठल्ले की डायरी’ नामक पुस्तक में हैं उसका ज़िक्र अवधेश प्रधान ने वक्तव्य में किया।विद्वान वक्ता ने कहा कि हरिशंकर परसाई जी एक ऐसे व्यंगकार थे जिनकी कलम से लिखे व्यंग बहुत गहरी मार करते हैं । उन्होंने हमेशा सामाजिक व् राजनैतिक जीवन के दोगलेपन , चाटुकारिता और ढोंग के बारे में खुलकर लिखा। उनके रचित व्यंग मात्र हंसी ठिठोली से कहीं अधिक होते हैं जो आपको मुस्कुराने के अलावा गम्भीरता  से सोचने पर मजबूर करते हैं।उन्होंने परसाई लिखित ठिठुरता हुआ गणतंत्र, सदाचार की ताबीज़ आदि पुस्तकों में वर्णित व्यंग्यों की चर्चा की जो आज भी प्रासंगिक है। एक सफल व्यंग्यकार की हैसियत से उन्होंने ‘तब की बात और थी’, ‘भूत के पांव पीछे, बेईमानी की परत’, ‘वैष्णव की फिसलन’, ‘पगडण्डियों का ज़माना’, ‘शिकायत मुझे भी है’, ‘सदाचार का ताबीज़’, ‘तुलसीदास चंदन घिसैं’,’हम इक उम्र से वाकिफ हैं’, ‘जाने पहचाने लोग की रचना की’।इसके अलावा उन्होंने कहानी संग्रह ‘हंसते हैं रोते हैं’, ‘जैसे उनके दिन फिरे’ और उपन्यास ‘रानी नागफनी की कहानी’, ‘तट की खोज’ लिखा।परसाई की रचनाएँ भय और आतंक को चीरकर रख देता है।उन्होंने कहा कि मानव चेतना के लिए लेखक को हमेशा विपक्ष का नेता बनकर रहना चाहिए।उन्हें सच्चा जीवन, सच्चा लेखन और सच्चा प्यार भी मिला।

मौजूदा हालात की गंभीरता की चर्चा करते हुए अ॰भा॰प्रगतिशील लेखक संघ के महासचिव डा॰सुखदेव सिंह सिरसा ने कहा “परसाई अच्छी तरह से जानते थे कि जब तक वैज्ञानिक चेतना युक्त जनता को लामबंद नहीं किया जायेगा, तब तक किसी भी प्रकार का लेखन बेमानी है।इसीलिए उन्होंने ने तत्कालीन लोकतंत्र के पाखंड और और उनके द्वारा अपनाये जा रहे रूढ़िवादी जीवन–मूल्यों की खिल्ली उड़ाते हुए धार-दार प्रहार किया और अवाम को तर्क, विवेक और विज्ञान–सम्मत दृष्टि से लेश किया।उन्होंने अपने व्यंग्य लेखन को एक सामाजिक कर्म के रूप अपनाकर जितनी मजबूती से अवाम की आवाज बनकर उभरे, उसका कोई अन्य उदहारण हमारे सामने नहीं है।वे आज भी हिन्दी साहित्य में अनमोल धरोहर है।”मौजूदा मोदी राज में दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी , विध्वंसवादी युवकों की जो भीड़ को हम देखते हैं इस पर उन्होंने परसाई जी की इन बातों को याद दिलाया न जब इंदिरा गांधी का शासन था, न बाजपेयी का और न मोदी का।परसाई जी ने कहा था,”“दिशाहीन, बेकार, हताश, नकारवादी, विध्वंसवादी युवकों की यह भीड़ खतरनाक होती है। इसका प्रयोग महत्वाकांक्षी खतरनाक विचारधारा वाले व्यक्ति और समूह कर सकते हैं।इस भीड़ का उपयोग नेपोलियन, हिटलर और मुसोलिनी ने किया था।यह भीड़ धार्मिक उन्मादियों के पीछे चलने लगती है। यह भीड़ किसी भी ऐसे संगठन के साथ हो सकती है, जो उनमें उन्माद और तनाव पैदा कर दे। फिर इस भीड़ से विध्वंसक काम कराए जा सकते हैं।यह भीड़ फासिस्टों का हथियार बन सकती है।हमारे देश में यह भीड़ बढ़ रही है। इसका उपयोग भी हो रहा है।आगे इस भीड़ का उपयोग सारे राष्ट्रीय और मानव मूल्यों के विनाश के लिए, लोकतंत्र के नाश के लिए करवाया जा सकता है।” यह आज बिल्कुल दिखाई दे रहा है।आख़िर देश में माब लिंचिंग, गौरक्षा, लव जेहाद, बच्चा चोरी आदि से जुड़ी घटनाओं के अतिरिक्त मुस्लिम टोपी और हिन्दू श्रेष्ठतावादी नारे लगाने के लिए लोगों को मजबूर किए जाने से जुड़ी घटनाएं इन धार्मिक उन्मादियों के द्वारा की जा रही है।परसाई ने वर्षों पहले कहा था ,””फासिस्ट संगठन की विशेषता होती है कि दिमाग सिर्फ नेता के पास होता है बाकी सब कार्यकर्ताओं के पास शरीर होता है।”डा॰सुखदेव सिंह सिरसा ने कहा कि परसाई कबीर परंपरा के लेखक थे। बेबाक़ लिखते थे।लेखक में जो विजन होना चाहिए, वह उनमें भरा हुआ था।।ये अपने दौर के भविष्यदृष्टा थे।आगे आने वाले ख़तरों से लोगों को व्यंग्य के ज़रिये आगाह कर रहे थे।

प्रलेस राज्य महासचिव डा॰ रवीन्द्रनाथ राय ने इस बहस में भाग लेते हुए परसाई द्वारा लिखित इन पंक्तियों को दोहराया , “लेखक अपने को आम जनता से जोड़ता है या नहीं?जोड़ता है तो वह हर सही जन-आन्दोलन में साथ देगा—-वरना कमरे में बैठकर कविता लिखेगा—-क़िस्म तो मर गये हैं,हम सुअर हैं, हमारी मरण तिथि यह है।’एक रचनाकार का समाज के प्रति दायित्व की तरह व्यंग्यकार का भी दायित्व है।परसाई जी अपनी पुस्तक ‘सदाचार की तमीज़’ में कहते हैं,”जीवन के प्रति व्यंग्यकार की उतनी ही निष्ठा होती है जितनी गम्भीर रचनाकार की—बल्कि ज़्यादा ही, वह जीवन के प्रति दायित्व का अनुभव करता है।” व्यंग्य जीवन का साक्षात्कार और आलोचना है।हमारे खोखले समाज का पर्दाफ़ाश यही करता है।इन्होंने समाज के विसंगतियों को उजागर किया।यह विसंगति आज भी समाज में मौजूद है।समाज के राजनीति का बधिया उघेरते हैं।आज समाज में ग़लत काम करने वाले की प्रशंसा होती है।इसपर परसाई के व्यंग्य मारक हैं।परसाई जी परिवर्तनकारी लेखक हैं।व्यंग्य की ताक़त पर बोलते हुए डा॰रवीन्द्रनाथ ने उनकी लिखी इन पंक्तियों को दोहराया,” ” व्यंग्य अब ‘शुद्र’ से ‘क्षत्रिय’ मान लिया गया है।विचारणीय है कि वह शुद्र से क्षत्रिय हुआ है ,ब्राह्मण नहीं, क्योंकि ब्राह्मण कीर्तन करता है।निस्संदेह व्यंग्य कीर्तन करना नहीं जानता है,पर कीर्तन और कीर्तन करनेवालों को खूब पहचानता है।कैसे-कैसे अवसर, कैसे-कैसे वाद्य और कैसी तानें ।जरा-सा ध्यान देंगे तो अचीन्हा नहीं रहेगा”हरिशंकर परसाई सिर्फ़ साहित्यकार नहीं थे बल्कि एक साहित्यिक कार्यकर्ता थे।

बिहार प्रलेस सचिव सतेन्द्र कुमार ने प्रलेस द्वारा पूरे देश में चल रहे परसाई जी की जन्म शताब्दी आयोजन के औचित्य से अवगत कराया।सतेन्द्र जी ने संक्षेप में उनकी जीवनी को बताते हुए कहा कि 22 अगस्त 1924 को होशंगाबाद, मध्य प्रदेश के जमानी ग्राम में जन्मे परसाई मध्यवर्गीय परिवार से आते थे। अल्पायु में ही मां की मृत्यु के बाद पिता की भी कालांतर में एक असाध्य बीमारी के बाद मृत्यु हो गई।अब चार छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी परसाई पर ही था।इस प्रकार इनका आरंभिक जीवन गहन आर्थिक अभावों के बीच बीता।अपने आत्मकथ्य ‘गर्दिश के दिन’ में उन्होंने बचपन की सबसे तीखी याद ‘प्लेग’ की भयावहता का ज़िक्र किया है। अपनी जीवनी में परसाई इस बात का खुलासा करते हुए कहते हैं कि बाल्यकाल में जिस व्यक्ति ने उन्हें सबसे ज़्यादा प्रभावित किया वह थीं उनकी बुआ।परसाई जी ने उनसे ही अपनी ज़िंदगी के कुछ मूल-मंत्र सीखे थे: जैसे, निस्संकोच किसी से भी उधार मांग लेना या बेफिक्र रहना। बड़े-से-बड़े संकट में भी वो यही कहते कोई घबराने की बात नहीं, सब ठीक हो जाएगा। परसाई के व्यक्तित्व में धार्मिक रूढ़िवादिता, जातीयता, धार्मिक कट्टरता इन सबके विरुद्ध जो एक खास किस्म का विरोधी तेवर दिखलाई पड़ता है उसका बहुत कुछ श्रेय वह अपनी बुआ को देते हैं।उनसे ही उन्होंने सीखा कि जातीयता और धर्म बेकार के ढकोसले हैं।

कोषाध्यक्ष सुनील कुमार सिंह ने कहा कि उन्होंनेगोर्की की तरह ज़िन्दगी पायी। ज़िन्दगी उसके लिए सबसे बड़ा विश्वविद्यालय है।वह ज़िन्दगी के क़रीब गया तो वर्गबद्ध ज़िन्दगी की ताक़त ने उनकी चेतना को फ़ौलादी बना दिया।कबीर कहते थे,”हम न मरिहै मरिहै संसारी।’ ‘जो घर ज़ारे आपना, सो चलै हमारे साथ।सब कहता आँखन की लेखी,मैं कहता आँखन की देखी।”कबीर की यही अक्खड़ता को परसाई सुनो भाई साधो, क़बिलाई खड़ा बाज़ार में, माटी कहे कुम्हार से जैसे कलमों से आगे बढ़ाया।‘मुझसे बुरा ना कोय’ कहते हुए कबीर रूढ़ियों को तोड़ता फिरता है तो परसाई अपने साथ पूरे वर्ग की आत्मलोचन करते हुए कहते हैं ”मैं काफ़ी बेहया हूँ।” मुक्तिबोध की तरह वह हमेशा अपने चारों ओर दुश्मन का जाल देखते हैं।इस प्रकार रचनाकार के रूप में परसाई के दो गहरे साथी हैं – कबीर और मुक्तिबोध। परसाई के व्यक्तित्व की एक महत्वपूर्ण विशेषता जो उन्हें एक अनोखा व्यंग्यकार बनाती है वो है, सच कह पाने का हौसला और उसके परिणामों को साहस के साथ स्वीकार कर पाने का जज़्बा।वे जिनकी कलई खोलते, निर्भीकता के साथ खोलते थे।सन 1975 में राष्ट्रीय आपातकाल के समय में सत्ता पक्ष के विपरीत जाकर सच कह पाने का साहस परसाई के निबंधों में ही दिखता है।राष्ट्र के धर्म-निरपेक्ष ताने-बाने को नष्ट करने वाले तत्वों को वो अपनी लेखनी के माध्यम से आड़े हाथों लेते थे।उनके राष्ट्र के धर्म-निरपेक्ष ताने-बाने को नष्ट करने वाले तत्वों को वो अपनी लेखनी के माध्यम से जमकर प्रहार करते थे। अपने प्रसिद्ध व्यंग्य निबंध संग्रह ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ के लिए सन 1982 में साहित्य अकादमी सम्मान प्राप्त करने वाले परसाई हिन्दी के एकमात्र व्यंग्यकार हैं।

पंजाब प्रलेस के महासचिव एवं शायर डा॰ सुरजीत जज ने अपने विचार रखे और कई शायरी को सुनाया। कार्यक्रम से पूर्व संपादक द्वय डा॰रवीन्द्रनाथ राय और नरेन्द्र कुमार के द्वारा संपादित पुस्तक ‘अपनों की नज़र में राजेन्द्र राजन’ का विमोचन आगत अतिथियों के द्वारा किया गया।यह पुस्तक प्रख्यात आलोचक विश्वनाथ त्रिपाठी और खगेन्द्र ठाकुर , अ॰भा॰ प्रगतिशील लेखक संघ के कार्यकारी अध्यक्ष एवं महासचिव क्रमश: विभूति नारायण राय एवं डा॰ सुखदेव सिंह सिरसा, बिहार राज्य प्रगतिशील लेखक संघ के अध्यक्ष डा॰ब्रजकुमार पाण्डेय, हरिद्वार प्रसाद सिंह, प्रो॰ अरूण कुमार, डा॰ सीताराम सिंह ‘ प्रभंजन’, परमाणु कुमार, सतेन्द्र कुमार, डा॰शशि भूषण प्रसाद शर्मा, नूतनदेव आनन्द, कस्तूरी झा’ कोकिल’, वकील मदन प्रसाद सिंह, रंगकर्मी अनिल पतंग, सुनीता गुप्ता, प्रो॰विमल जैसे विशिष्ट व्यक्तियों के लेखों का संग्रह है।

पूरे कार्यक्रम का संचालन संचालन बिहार प्रलेस के कार्यसमिति की सदस्य एवं नगर निगम की वार्ड पार्षद शगुफ्ता ताजवर ने किया।स्वागत भाषण ज़िला सचिव कुंदन कुमारी ने किया। धन्यवाद ज्ञापन कन्हाई पंडित ने किया।इस अवसर पर प्रलेस सचिव राम कुमार, समय सुरभि अनन्त के संपादक नरेन्द्र कुमार सिंह, अमरनाथ सिंह, राजेन्द्र नारायण सिंह, प्रभा कुमारी, अमरशंकर झा, डा॰अशोक कुमार गुप्ता, राजकिशोर सिंह, दिलेर अफ़ग़ान,राजनारायण सिंह, स्वाति गोदर, कामिनी कुमारी, रामाधार कुमार, पुष्कर प्रसाद सिंह, मनोरंजन विप्लवी, सुदर्शन कुमार,अलख निरंजन आदि उपस्थित थे।

सुनील कुमार सिंह

लेखक, विश्लेषण एवं टिप्पणीकार

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