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नये संसद भवन और लोकतांत्रिक मूल्यों का मौजूदा दौर – राज कुमार शाही

नई संसद भवन के उद्घाटन समारोह और उसके चंद दूरी पर न्याय के लिए संघर्षरत बहादुर बेटियां और उनके साथ किए गए बर्ताव मौजूदा दौर में लोकतांत्रिक मूल्यों का क्या हाल है बयान करने के लिए काफी है। पाकिस्तान के प्रसिद्ध शायर हफीज़ जालंधरी ने तंज़ कसते हुए शेख अब्दुल्ला से कहा था कि “शेख़ सरहद के दोनों तरफ जाहिलों की भरमार है, फर्क बस इतना है कि तुम्हारे पास नेहरू है जिस दिन नेहरू चले गए उस दिन हममें अर्थात पाकिस्तान और तुममें भारत में कोई फर्क नहीं बचेगा”। इधर काफी तेजी से यह फर्क मिटता जा रहा है संविधान और उसके मूल्यों को एक एक करके रौंद कर हिंदुत्व पर आधारित शासन की तरफ हमारा देश आगे बढ़ रहा है। जिस संसद में कभी साइंटिफिक टेम्परामेंट बढ़ाने के लिए बहसें हुआ करती थी अब वहां जय श्री राम और हिंदू राष्ट्र बनाने की बातें हो रही है।

जिस मूल्क की बहुतायत आबादी पांच किलो अनाज के लिए हर महीने लाइन में खड़े होने को अभ्यस्त हो उस देश में भूखमरी और ग़रीबी का अंदाजा लगाया जा सकता है। बेरोज़गारी अपने चरम सीमा पर पहुंच गई है फिर भी हम गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। नई संसद नये उभरते हुए भारत के नये संकल्प को साकार करेंगी ऐसी बात प्रधानमंत्री लगातार कह रहे हैं। इस नए संसद में लोकसभा अध्यक्ष के आसन के नजदीक सेंगोल को प्रतिष्ठित किया गया है जो राजशाही का प्रतीक है। इस उद्घाटन समारोह में लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका भी हास्यास्पद दिखाई दे रही थी साथ ही साथ भारतीय संसद के प्रमुख राष्ट्रपति को इस आयोजन से दूर रखा जाना सचमुच एक नई राजनीतिक मूल्यबोध को दर्शाता है। नई संसद भवन में ठीक सत्यमेव जयते के नीचे ब्रजभूषण शरण सिंह जिनके उपर पॉस्को के तहत मामला दर्ज है बड़े शान के साथ गरिमा बढ़ा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ ओलंपिक गोल्ड मेडल जीतने वाली महिला खिलाडियों द्वारा न्याय के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। सिर्फ दीवारों पर मोटे अक्षरों में सत्यमेव जयते लिख देने से नहीं होगा बल्कि यह दिखाई भी पड़नी चाहिए कि न्याय के समक्ष सभी बराबर हैं।

कांग्रेस ने अपने लम्बे शासनकाल में बहुत सारे गलतियां की थी जिसका खामियाजा आज उसे भुगतना पड़ रहा है इसके बावजूद आज सभी विपक्षी पार्टियां एक साथ भारतीय जनता पार्टी की तानाशाही रवैया के खिलाफ संघर्ष करने के लिए एकताबद्ध है। आज खुलेआम हिंदू राष्ट्र बनाने की बात संवैधानिक पद पर आसीन जनप्रतिनिधियों द्वारा किया जा रहा है। 28 मई को नई संसद को उद्घाटन का दिन चुना जाना भी एक बदले हुए हालात को दर्शाता है।28 मई सावरकर का जन्म दिन है जिन्होंने अपने शुरुआती दिनों में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ क्रांतिकारी संघर्ष का नेतृत्व किया था लेकिन बाद के दिनों में आरएसएस एवं हिन्दुत्व के विचारों से प्रभावित होकर अंग्रेजी हुकूमत को मददगार होकर विभिन्न क्रांतिकारी आंदोलन के लिए मुखबिरी का काम किया इसके लिए बाजाप्ता साठ रुपए प्रति महीने की रकम लेते रहे। साथ ही साथ अपनी पुस्तक “हिंदुत्व” में हिंदू राष्ट्र के लिए एक खाका खींचा है।आरएसएस और हिंदू महासभा जैसी संगठनों ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ कोई संघर्ष में हिस्सा नहीं लिया बल्कि मुस्लिम लीग के साथ द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को अमली जामा पहनाने में मदद करता रहा है।

आजादी के ठीक बाद गांधी जी की हत्या में शामिल रहा जिसके चलते प्रतिबंध लगाया गया था। आज अंग्रेजी हुकूमत के साथ अपनी सहयोगी भूमिका निभाने वाली एक बड़ी जमात संसदीय राजनीति से शीर्ष पर पहुंच गई आजादी के बाद विकसित संसदीय मूल्यों को एक-एक करके खत्म कर देना चाहते हैं। समाज में आपसी सहयोग और भाईचारा को खत्म कर नफरत की राजनीति में सक्रिय हैं। इसके लिए धर्म और जाति की राजनीति को बढ़ावा देने में कोई कसर उन्होंने नहीं छोड़ा है। हमारी जो कमजोरियां थी जिसे एक- एक करके खत्म करने की दिशा में हमें आगे बढ़ना था लेकिन उन्हीं कमजोरियों को आधार बनाकर हमें बांटते चले गए और सक्ता के शीर्ष तक पहुंच गए। मजदूर वर्ग अपने वर्गीय चेतना को त्यागकर अपने अन्य पहचानों को लेकर आज अपनी राजनीतिक चाल चल रहा है।

अव्यवस्था और अराजकता के इस दौर में सारे संसदीय मानक ध्वस्त हो गए। वैसे भी पूंजीवादी लोकतंत्र में मजदूर वर्ग को थोड़ी बहुत रियायत दी गई थी मौजूदा दौर में वे सभी रियायतें भी एक एक करके छीन लिया गया। आज इसने अपने सारे नैतिक मूल्यों को तिलांजलि देकर सिर्फ और सिर्फ कारपोरेट घरानों एवं पूंजीपतियों की सेवा में समर्पित कर दिया है। उसने अपने लोकतांत्रिक होने के अधिकार को बहुत पहले छोड़ दिया है इसके लिए बहुसंख्यक समुदाय को सिर्फ उसके धार्मिक भावनाओं को तुष्टिकरण कर एवं एक खास समुदाय के प्रति नफ़रत की राजनीति करते हुए अपने एजेंडे को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। कबीर दास की इस पंक्ति में अपनी पीड़ा व्यक्त करते हैं जिसमें कबीर ने कहा है कि


“सुखिया सब संसार है,खावे अरू सोवै।
दुखिया दास कबीर है, जागे अरू रोवै।।
समाज का बहुतायत हिस्सा उसके साथ हो रहे व्यवस्थागत लूट और अन्याय से अनजान इसे अपने भाग्य का दोष समझकर हर दर्द को पी लेना चाहता है इस लूट को जारी रखने में बाबा और काबा दोनों बराबर के हिस्सेदार हैं। फिलहाल अपने हक़ और न्याय के लिए लड़ रही बेटियों को क्रांतिकारी सलाम उनके जज्बे को बहुत बहुत सलाम , इस उम्मीद के साथ कि लड़ेंगे और जीतेंगे इंकलाब जिंदाबाद।।

राज कुमार शाही

सदस्य 'प्रगतिशील लेखक संघ' एवं स्वतंत्र पत्रकार।

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