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नए संसद भवन का उद्घाटन, मोदी जी हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए इसे सत्ता हस्तांतरण के अवसर के रूप में देखा? : राम बाबू कुमार

सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक स्वरूप सेंगोल ब्रिटिश भारत के अंतिम वायसराय लार्ड माउंटबेटन ने पंडित जवाहर लाल नेहरू को दिया था, जिसे इलाहाबाद स्थित आनंदभवन संग्रहालय में प्रदर्श के रूप में रखा गया। इस बार तो नये संसद भवन का उद्घाटन हो रहा था। नेहरू अथवा कोई अन्य प्रधानमंत्री मोदी जी को न तो सत्ता हस्तांतरित कर रहा था, न ही देश कोई आजादी की जंग जीत रहा था, फिर इस प्रतीक-चिह्न को लोक सभा स्पीकर की पीठ के साथ प्रस्थापित करने का क्या तात्पर्य?

आखिरकार भारत के नये संसद भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी ने विनायक दामोदर सावरकर के जन्म दिन पर 28 मई को कर ही डाला और इस प्रकार भारत गणराज्य की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मूर्मू को न सिर्फ उनके संवैधानिक दायित्व से मुक्त कर दिया अपितु उनके मुख से यह भी कहलवा दिया कि मोदी जी विराट जनाकांक्षा के निर्वाचित प्रतिनिधि हैं, इसलिए यह कार्यभार उन्हीं के द्वारा संपादित होना सर्वाधिक उचित भी था।
यद्यपि देश के प्रायः 21 विपक्षी दलों ने इस समारोह का बहिष्कार किया, फिर भी मोदी जी ने पांच-छः अन्य विपक्षी दलों समेत कम से कम 25 दलों का जुगाड़ कहां से कर लिया ‘यह एक ऐसा प्रश्न है जिसका जवाब तो चुनाव आयोग के रेकॉर्ड से ही मिल सकता है। क्योंकि आमजनों की नजर से उनका अस्तित्व ओझल है। ऐसी नजी़र पेश करनेवाला एक ही देश है जहाँ शासन तो एक ही दल विशेष का है,मगर उनका दावा है कि वहाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम है, जिसमें कम से कम आठ लोकतांत्रिक दल हैं जो सत्ताधारी दल से प्रतिबद्धता रखकर उसे समर्थन, सहयोग और सलाह देते हैं।

लोकतंत्र का ऐसा विरल उदाहरण अन्यत्र खोजे नहीं मिलेगा। मुमकिन है, मोदी जी उससे प्रेरणा ले भारत को वैसी ही लोकशाही में तब्दील करने का मार्ग प्रशस्थ कर रहे हों!
नूतन संसद भवन के उद्घाटन की पूरी प्रक्रिया, किंतु कहीं अधिक संशयपूर्ण दूरगामी फलाफल का संदेश दे गयी। उसके कुछेक द्रष्टव्य पक्ष इस प्रकार रहे-

प्रातः प्रधानमंत्री ने भवन निर्माण में लगे मजदूरों को सम्मानित किया और इस अवसर पर सर्वधर्म प्रार्थना सभा भी उनके लिए विशेष तौर पर आयोजित करायी थी।
अपने लिए उन्होंने दूसरा मार्ग निर्धारित कर रखा था, जो सर्वधर्म प्रार्थना सभा से नितांत भिन्न रहा। पहले उन्होंने सावरकर के पोर्ट्रेट के समक्ष सेंट्रल हाल में शीश नवाया, और फिर तमिलनाडु के अधीनम मठ के संतों की मौजूदगी में बहुप्रचारित सेंगोल को षष्टांग दंडवत करने का दृश्यांकन कराया। इस अनुष्ठान के लिए मोदी जी ने आर्य परंपरा के अनुरूप विशेष रूप से धोती भी धारण कर रखी थी।


गौरतलब बात यह कि सत्ता हस्तांतरण के प्रतीक-स्वरूप सेंगोल ब्रिटिश भारत के अंतिम वायसराय लार्ड माउंटबेटन ने पंडित जवाहर लाल नेहरू को दिया था, जिसे इलाहाबाद स्थित आनंदभवन संग्रहालय में प्रदर्श के रूप में रखा गया। इस बार तो नये संसद भवन का उद्घाटन हो रहा था, नेहरू अथवा कोई अन्य प्रधानमंत्री मोदी जी को न तो सत्ता हस्तांतरित कर रहा था, न ही देश कोई आजादी की जंग जीत रहा था, फिर इस प्रतीक-चिह्न को लोक सभा स्पीकर की पीठ के साथ प्रस्थापित करने का क्या तात्पर्य?
कहीं ऐसा तो नहीं कि इसी बहाने मोदी जी ने सावरकर के सपनों का हिन्दू राष्ट्र बनाने के लिए इसे सत्ता हस्तांतरण के अवसर के रूप में देखा और प्रकारांतर से उसकी प्राण-प्रतिष्ठा के अनुष्ठान में उक्त अवसर को बड़े चातुर्य के साथ तब्दील कर दिया?


इसका दूसरा पक्ष भी कम सनसनीखेज प्रतीत नहीं होता, और वह यह कि तमिलनाडु के संतों की मानिंद से सेंगोल की प्राणप्रतिष्ठा करते हुए जिस तरह से शैव मत/संप्रदाय का स्तुतिगान किया गया उससे यह नतीजा निकालना असंगत नहीं होगा कि राजनीति के चतुर खेलाड़ी मोदी जी और सत्ताप्रतिष्ठान के रिमोट कंट्रोल-आर एस एस की निगाहें तमिलनाडु के बहाने पूरे दक्षिण भारत में वोट बैंक बढ़ाने पर हो। यदि ऐसा नहीं होता तो संघी- भाजपाई मानस ऋग्वैदिक काल से आरंभ कर रुद्र, पशुपति, महादेव से शिव के देवत्व के विकासक्रम का उल्लेख करने से नहीं चूकता. कुल मिलाकर यहां आस्था पर व्यावहारिक राजनीति भारी पड़ती दिखाई पड़ती है। सत्तासुख के लिए कछ भी कर सकते हैं ये लोग।
दिलचस्प बात यह भी कि लोक सभा के स्पीकर ओम बिरला ने उक्त अवसर पर मोदीजी का यशस्वी प्रधानमंत्री के रूप में यशोगान किया, पर जो कुछ जैसे भी वहां हो रहा था उसके मद्देनजर उनसे लगता है एक चूक हो गयी – उन्हें जन्मना राजा/सम्राट की उपाधि से नवाजना भूल गये।


एक लोमहर्षक बात यह भी कि जिस समय मोदीजी अपने सपनों के नये भारत के नूतन संसद भवन में उद्घाटन भाषण दे रहे थे और इक्कीसवीं सदी में आत्मनिर्भर विकसित भारत के लोकतंत्र, एक भारत-श्रेष्ठ भारत का सब्जबाग दिखा रहे थे, ठीक उसी समय संघर्षरत पहलवानों(रेसलर्स) को जंतर मंतर से जबरन खदेड़कर, उनके साथ हाथापाई कर, उन्हें मारपीटकर, यहां तक कि महिला रेसलर्स के साथ जोर जबर्दस्ती कर सबको गिरफ्तार करते हुए पुलिसिया तांडव रचाकर लोकतंत्र को लहुलुहान कर रहे थे। मीडिया की मेहरबानी कि कम ही सही लोकतंत्र के नये मंदिर (प्रधानमंत्री की जुबानी) के भीतर के साथ-साथ बाहर सड़कों पर हो रही लोकतंत्र की हत्या के दृश्य एक के बाद एक दिखा रहे थे।
सबका निहितार्थ संप्रति काल गर्भ में है। जरूरत फिर भी, न सिर्फ सतर्क, सावधान, सचेत व सचेष्ट रहने की है अपितु सक्रिय हो प्रतिरोध की ज्वालामुखी खड़े करने की है क्योंकि संकट गहरा है, महाकाय राक्षस सामने मुंह बाये खड़ा है।

राम बाबू कुमार ( भाकपा नेता व स्वतंत्र पत्रकार)

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